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Tuesday, January 17, 2017

अनुक्रमणिका










Monday, October 21, 2013

प्रस्तावना एवं प्राक्कथन


प्रस्तावना
(प्रथम संस्करण से)


एक काँटा है, जो हर हिन्दुस्तानी के दिल में चुभा था- 18 अगस्त 1945 के दिन। उस दिन से आज तक इस देश में तीसरी पीढ़ी जवान हो चुकी है, मगर उस काँटे की जो चुभन है, वह अब तक बनी हुई है। हर पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को यह चुभन, यह दर्द, विरासत में दे जाती है।
क्या हुआ था- 18 अगस्त 1945 को ताईपेह में? क्या वाकई नेताजी को ले जाने वाला विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था और उसमें हमारे प्रिय नेताजी की मृत्यु हो गयी थी? अगर ऐसा ही है, तो फिर भारत-जापान-रूस सरकारों द्वारा नेताजी से जुड़े दस्तावेजों को अति गोपनीयआलमारियों में कैद रखने के पीछे तर्क क्या है?
ऐसा नहीं है कि इस पुस्तक में सिर्फ इसी एक प्रश्न का उत्तर तलाशने की कोशिश की गयी है। बल्कि देखा जाय, तो यह पुस्तक मुख्यरुप से नेताजी की अन्तरराष्ट्रीय गतिविधियों- 1941 से 1945 तक के घटनाक्रमों- पर केन्द्रित है।
कम ही भारतीय जानते होंगे कि 1941 में देश छोड़ते समय नेताजी ने जियाउद्दीनका नाम धारण किया था; जर्मनी में उन्हें हिज एक्सेलेन्सी माजोत्ताका नाम मिला हुआ था; पनडुब्बी-यात्रा के दौरान उनका कूट नाम मस्तुदाथा, और जापान में उन्हें चन्द्र बोसनाम से सम्बोधित किया जाता था।
इसी प्रकार, नेताजी ने जर्मनी में भी एक सेना गढ़ी थी; उनकी पनडुब्बी-यात्रा 90 दिनों की थी; माडागास्कर के पास वे जर्मन से जापानी पनडुब्बी में सवार हुए थे; सिंगापुर में आई.एन.ए. का गठन रासबिहारी बोस ने किया था- ये जानकारियाँ भी आम नहीं हैं।
इन जानकारियों के लिहाज से देखा जाय, तो नयी पीढ़ी के लिए यह पुस्तक जरूर पढ़ेंकी श्रेणी में आती हैं।
नेताजी की अन्तरराष्ट्रीय गतिविधियों तथा उनके इम्फाल-कोहिमा युद्ध के बारे में पर्याप्त जानकारियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तकों में नहीं मिलती। दरअसल, नेताजी की छवि एक ऐसे नायक की बनती है, जिसने सत्ताके खिलाफ सैन्य बगावतकी थी। भले यह बगावत स्वतंत्रताके लिए थी और भले नेताजी के आदर्श एवं उनका व्यक्तिगत चरित्र बहुत ही ऊँचे दर्जे का था; फिर भी, ‘सत्ताधारीतो सत्ताधारी ही होते हैं- चाहे वे ब्रिटेन के हों, या भारत के। वे भला यह क्यों चाहने लगे कि उनकी जनता एक बागीके चरित्र से प्रभावित हो!
सच पूछा जाय, तो इसी पुस्तक में कई ऐसे प्रसंग आये हैं, जिन्हें हमारी पाठ्य-पुस्तकों में शामिल करने पर विचार किया जा सकता है।
एक और प्रश्न उठाया गया है इस पुस्तक में- क्या वास्तव में हमारी अहिंसात्मक नीतियोंसे अँग्रेजों का हृदय परिवर्तनहो गया था, जिस कारण वे देश छोड़कर चले गये? या फिर, नेताजी की सैन्य गतिविधियों तथा आई.एन.ए. सैनिकों के कोर्ट-मार्शल के बाद नागरिकों में उभरे आक्रोश और सेना में हुई बगावतों के कारण अँग्रेजों को यहाँ राज करना असम्भव लगने लगा था? समय आ गया है कि इस सवाल पर एक खुली तथा सार्थक बहस हो जानी चाहिए!
सारी पुस्तक में नेताजी के व्यक्तित्व का कुछ ऐसा भव्य रुप में उभरकर सामने आता है कि हिटलर, मुसोलिनी, तोजो, स्तालिन, चर्चिल, रूजवेल्ट इत्यादि तमाम तत्कालीन नेताओं के चरित्र फीके नजर आते हैं।
अपने व्यक्तिगत जीवन में नेताजी ने बहुत कष्ट उठाये; उनका दिल्ली चलोका सपना भी पूरा नहीं हो पाया- इन बातों की टीस को हमारे दिलों में जगाने में भी यह पुस्तक सफल रही है।
काश, कि नियति ने नेताजी को एक त्रासद नायकबनाने की अपेक्षा उन्हें स्वतंत्र भारत का पहला स्टेट्समैनबनाने का निर्णय लिया होता! ...तो आज भारत की तस्वीर कुछ और ही होती! वैसे, क्या सब खत्म हो गया है? नेताजी के सपनों के भारत का निर्माण क्या अब हम नहीं ही कर सकते? सोचना पड़ेगा...
2012, या इसके बाद भारत के पुनर्निमाण/पुनरुत्थान का अगर कोई दौर शुरु होता है, और उसे शुरु करने में इस पुस्तक की भी थोड़ी-बहुत भागीदारी होती है, तो इसमें आश्चर्य कुछ नहीं!

-डॉ. राजेन्द्र अग्रवाल
दिल्ली
23 जनवरी 2012


प्राक्कथन
(द्वितीय संस्करण से)


जय हिन्द!
प्रस्तुत पुस्तक मुख्य रुप से नेताजी की अन्तरराष्ट्रीय गतिविधियों पर केन्द्रित है; अर्थात् 17 जनवरी 1941 से 18 अगस्त 1945 तक के घटनाक्रमों पर। नेताजी से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से जुड़ी इस दौर की ऐसी बहुत-सी बातें हैं, जिनके बारे में हम अक्सर कम ही जानते हैं। जबकि हर भारतीय को- खासकर, देश की किशोर एवं युवा पीढ़ी को- इन्हें जानना चाहिए।     
17 जनवरी 1941 से पहले के कुछ घटनाक्रमों को- भूमिका के तौर पर- बहुत संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है; जबकि 18 अगस्त 1945 के बाद के सम्भावितघटनाक्रमों को विस्तार दिया गया है, ताकि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का तार्किक विश्लेषण किया जा सके। कुछ अन्य सम्बन्धित विषयों को भी छुआ गया है।   पुस्तक को वर्तमान कालमें लिखने की कोशिश की गयी है- कुछ हद तक तथा कहीं-कहीं रिपोर्ताजवाली शैली में- ताकि पढ़ते वक्त ऐसा न लगे कि हम सुदूर इतिहास की बातों को जान रहे हैं, बल्कि ऐसा लगे कि घटनायें हमारे समय में ही घट रही हों!
देश की किशोर एवं युवा पीढ़ी अगर इस पुस्तक से कुछग्रहण कर पाती है, तो पुस्तक के उद्देश्य को सफल माना जायेगा।                  

21 अक्तूबर, 2013                                             - जयदीप शेखर


तृतीय संस्करणः
      
पुस्तक को तीसरी बार सम्पादित एवं संशोधित किया गया है। इस बार का मुख्य आकर्षण है- पुस्तक के बीच-बीच में कुछ चित्रों का समावेश।

18 अगस्त 2015                                               - ज. शे.


Sunday, December 12, 2010

5.7 नेताजी के सपने को साकार करना है...




कहते हैं कि सूर्योदय से पहले का अन्धेरा कुछ ज्यादा ही घना होता है। एक घोटालेबाज देश के रुप में बदनाम हो रहा हमारा देश शायद उसी अन्धेरे के दौर से गुजर रहा है।
गुलामी का दौर भी अन्धेरे का ही दौर था। उस वक्त नेताजी किस प्रकार के शासन के बारे में सोचते थे यह उनके निम्न कथन से जाहिर होता हैः
ब्रिटिश साम्राज्यवाद के बाद इस भारत में पहले बीस वर्ष के लिये तानाशाही राज्य कायम होनी चाहिये। एक तानाशाह ही देश से गद्दारों को निकाल सकता है।
भारत को अपनी समस्याओं के समाधान के लिये एक कमाल पाशा की आवश्यकता है।
(उल्लेखनीय है कि नेताजी कमाल अतातुर्क पाशाको अपना आदर्श मानते थे, जिनकी तानाशाही की बदौलत तुर्की के लोग आज अपने देश को दकियानूस अरब जगत का हिस्सा नहीं, बल्कि आधुनिक यूरोपीय देशों के समकक्ष मानते हैं।)
नेताजी ने ये बातें भले आजादी से बहुत पहले कही थीं, मगर आजादी के 64 वर्षों के बाद आज इन कथनों की सार्थकता अचानक बढ़ गयी है।
नेताजी के कथन में जिन्हें गद्दारकहा गया हैं, आज भी वे हमारे बीच भ्रष्ट राजनेता, भ्रष्ट उच्चाधिकारी, भ्रष्ट पूँजीपति और माफिया सरगना के रुप में मौजूद हैं- इसमें कोई दो राय नहीं है।
समय आ गया है कि नेताजी-जैसा कोई व्यक्ति देश की सत्ता सम्भाले, गद्दारों को (व्यवस्था से) निकाल बाहर करे, देश की समस्याओं का समाधान करते हुए आदर्श लोक’-तंत्र या जन’-तंत्र की स्थापना करे और विश्व के मानचित्र पर देश को वह स्थान दिलाये, जिसका वह हकदार है।
अगर यह सब कुछ कुछ वर्षों के एकच्छत्रीयलोकतंत्र (राष्ट्रपति प्रणाली-जैसी, या तानाशाही- डिक्टेटरशिप- ही सही) से भी आता है, तो हर्ज क्या है?
वयोवृद्ध अर्थशास्त्री डॉ. अरूण घोष के इस कथन पर नजर डालिये, जिससे पता चलता है कि आज हमारा संसदीयलोकतंत्र (अब तो गठबन्धन अनिवार्य हो चला है) कोई बहुत अच्छे ढंग से काम नहीं कर रहा हैः  
मैं तो केवल सर्वनाश देख सकता हूँ। भविष्य में क्या होगा, इसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकता। पर समाज विचलित हो रहा है। जनता की नाराजगी बढ़ रही है। मेरा मानना है कि संसद वर्तमान स्थिति को रोकने की हालत में नहीं है। सभी पार्टियाँ इन नीतियों (उदारीकरण) की समर्थक हैं, और सांसदों में सड़क पर आने का दम नहीं है।
मुझे तो लगता है कि एक लाख लोग अगर संसद को घेर लें, तो शायद कुछ हो।
              डॉ. अरूण घोष ने ये बातें दैनिक जनसत्ताको दिये गये अपने साक्षात्कार में कही थी। यह साक्षात्कार 30 जुलाई 1998 को प्रकाशित हुआ था।
***
         अन्त में, गाँधीजी के विचारों को पढ़ा जाय, जिसे पढ़कर ऐसा लगेगा, मानो सात-आठ दशकों पहले ही उनकी अन्तर्दृष्टि ने हमारे आज के संसदीय लोकतंत्रको देख लिया थाः
              ”ऐसा सामान्यतया माना जाता है कि संसद-सदस्य पाखण्डी एवं स्वार्थी होते हैं। सभी अपने छोटे-छोटे हितों की सोचते हैं। सदस्य बिना सोचे ही अपनी पार्टी को संसद में वोट देते हैं। तथाकथित अनुशासन ही उन्हें बाँधे रखता है। अपवाद स्वरुप अगर कोई संसद-सदस्य स्वतंत्र वोट करता है, तो उसे विश्वासघाती मान लिया जाता है।
                ”प्रधानमंत्री संसद के कल्याण से ज्यादा अपनी शक्ति के लिए चिन्तित रहता है। उसकी ऊर्जा पार्टी की सफलता प्राप्त कराने में ही लगी रहती है। उसे यह चिन्ता नहीं रहती है कि संसद को सही काम करना चाहिए।
              ”अगर वे (प्रधानमंत्री) ईमानदार माने जाते हैं, तो इसलिए क्योंकि वे वह नहीं लेते, जिसे सामान्यतया घूस माना जाता है। लेकिन कुछ दूसरी प्रभावी विधियाँ भी हैं। वे अपने हितों को साधने के लिए लोगों को पुरस्कार एवं सम्मान के रूप में घूस देते हैं। मैं यह कहने को मजबूर हूँ कि वे न तो सच्चे ईमानदार हैं और न ही उनकी अन्तरात्मा जीवित है।
                (यह कथन इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय’- ‘इग्नू’- की पाठ्य-पुस्तक आधुनिक भारतीय राजनीतिक विचारधाराके खण्ड- 3 (EPS- 3), पृष्ठ- 10 से उद्धृत है। नेताजी का कथन भी इसी पुस्तक से लिया गया है।)
***
सच पूछा जाय, तो देश को इस वक्त एक ऐसे स्टेट्समैनकी जरुरत है, जो 1. दस वर्षों के लिए देश में तानाशाही कायम करे; 2. मार्गदर्शन के लिए विभिन्न विषयों के विद्वानों/विशेषज्ञों का एक मंत्रीपरिषद बनाये, और 3. गरीबों एवं आम लोगों के लिए फूल से भी कोमलतथा अमीरों एवं खास लोगों के लिए वज्र से भी कठोरनीतियों को अनुसरण करते हुए निम्न कार्य करे-
·         1943 में 21 अक्तूबर के दिन सिंगापुर में नेताजी सुभाष द्वारा स्थापित स्वतंत्र भारत की अन्तरिम सरकारको वैधानिक मान्यता दे।
·         सत्ता-हस्तांतरण की शर्तों को रद्द करे।
·         राष्ट्रमण्डल (कॉमनवेल्थ) की सदस्यता का परित्याग करे।
·         नेताजी सुभाष को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधान का सम्मान दे।
·    1935 (बल्कि 1858) के अधिनियम पर आधारित वर्तमान संविधान के स्थान पर भारत-भारतीय-भारतीयतापर आधारित एक नया संविधान लागू करे।
·         देश के सभी बड़ेभ्रष्टों को निकोबार के किसी टापू पर कैद करे।
·         सरकारी खजाने की लूटी/बर्बाद की गयी राशि की पाई-पाई वसूले।
·         विश्व-बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन द्वारा संचालित शोषण-दोहन-उपभोगपर आधारित वर्तमान विश्व अर्थनीति के चंगुल से देश को मुक्त कराये।
·         ‘समता-पर्यावरणमित्रता-उपयोगपर आधारित जनकल्याणकारी नीतियों को लागू करे।
·      1:15 के अनुपात पर नया सरकारी वेतनमान बनाकर इसी वेतनमान पर बहालियाँ करके नयी भारतीय राष्ट्रीय सेना, पुलिस, प्रशासन, न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, इत्यादि व्यवस्था का गठन करे।
·         हर नागरिक को शिक्षित बनाये।
·         हर हाथ को रोजगार दे।
·         हर देशवासी के दिल में भारतीयताके अहसास को जगाये।
·   भारतीय प्रतिभा, भारतीय श्रमशक्ति तथा भारतीय संसाधनों के बल पर भारत को खुशहाल, स्वावलम्बी तथा शक्तिशाली राष्ट्र बनाये।
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टिप्पणी:
मैंने अपनी ओर से नेताजी सुभाष के सपनों के भारत के निर्माण के लिए एक खाका तैयार कर रखा है, जो एक “घोषणापत्र” (MANIFESTO) के रुप में है। अगर आप इस मामले में गम्भीर हैं, तो आपको इस पर भी एक नजर डालनी चाहिए और इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करनी चाहिए।
वह घोषणापत्र ब्लॉग पर भी है और eBook के रुप में भी। पढ़ने एवं वितरण के लिए eBook उपयुक्त है- यह निश्शुल्क (Free of Cost) है, जबकि इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए आपको इसके Blog पर आना चाहिए
eBook डाउनलोड करने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें और Blog पर जाने के लिए यहाँ
इति, धन्यवाद।
-ज. शे.