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"नाज़-ए-हिन्द सुभाष" ब्लॉग को पुस्तक का रुप दे दिया गया है,जिसका आभासी (eBook) एवं मुद्रित (Print Book) संस्करण- दोनों उपलब्ध है

Sunday, December 12, 2010

5.7 नेताजी के सपने को पूरा करना है...



5.6 यह देश और इसकी नियति 5.6 (क) अगर नेताजी दिल्ली पहुँच जाते तो...




Monday, November 22, 2010

5.3 ऐसे आयी आजादी

Rakesh Mishra said...
Great note.... worth reading 1000 times.... 


RAJ SINH said...

उसी नेवी की बगावत के सिपाहियों को गाँधी ने 'सिपाही नहीं गुण्डे' कहा था और अँग्रेजों ने उस विद्रोह को बेरहमी से कुचलने में कामयाबी पाई थी. जिस पर बगावती सिपाहियों को गोलियों से भून दिए जाने पर प्रसिद्ध इन्क्लाबी शायर 'साहिर लुधियानवी' ने लिखा था .........


ए रहबर मुल्को कौम बता, ये किसका लहू है कौन मरा
क्या कौमो वतन की जय गाकर मरते हुए राही गुण्डे थे
जो बागे गुलामी सह न सके वो मुजरिम-ए-शाही गुण्डे थे
जो देश का परचम ले के उठे वो शोख सिपाही गुण्डे थे
जम्हूर से अब नज़रें न चुरा अय रहबर मुल्को कौम बता
ये किसका लहू है कौन मरा .........

(रहबर= नेता, परचम= झण्डा, जम्हूर=जनता)

5.2 आजाद हिन्द सैनिकों का क्या हुआ?