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Monday, October 21, 2013

प्रस्तावना एवं प्राक्कथन


प्रस्तावना
(प्रथम संस्करण से)


एक काँटा है, जो हर हिन्दुस्तानी के दिल में चुभा था- 18 अगस्त 1945 के दिन। उस दिन से आज तक इस देश में तीसरी पीढ़ी जवान हो चुकी है, मगर उस काँटे की जो चुभन है, वह अब तक बनी हुई है। हर पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को यह चुभन, यह दर्द, विरासत में दे जाती है।
क्या हुआ था- 18 अगस्त 1945 को ताईपेह में? क्या वाकई नेताजी को ले जाने वाला विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था और उसमें हमारे प्रिय नेताजी की मृत्यु हो गयी थी? अगर ऐसा ही है, तो फिर भारत-जापान-रूस सरकारों द्वारा नेताजी से जुड़े दस्तावेजों को अति गोपनीयआलमारियों में कैद रखने के पीछे तर्क क्या है?
ऐसा नहीं है कि इस पुस्तक में सिर्फ इसी एक प्रश्न का उत्तर तलाशने की कोशिश की गयी है। बल्कि देखा जाय, तो यह पुस्तक मुख्यरुप से नेताजी की अन्तरराष्ट्रीय गतिविधियों- 1941 से 1945 तक के घटनाक्रमों- पर केन्द्रित है।
कम ही भारतीय जानते होंगे कि 1941 में देश छोड़ते समय नेताजी ने जियाउद्दीनका नाम धारण किया था; जर्मनी में उन्हें हिज एक्सेलेन्सी माजोत्ताका नाम मिला हुआ था; पनडुब्बी-यात्रा के दौरान उनका कूट नाम मस्तुदाथा, और जापान में उन्हें चन्द्र बोसनाम से सम्बोधित किया जाता था।
इसी प्रकार, नेताजी ने जर्मनी में भी एक सेना गढ़ी थी; उनकी पनडुब्बी-यात्रा 90 दिनों की थी; माडागास्कर के पास वे जर्मन से जापानी पनडुब्बी में सवार हुए थे; सिंगापुर में आई.एन.ए. का गठन रासबिहारी बोस ने किया था- ये जानकारियाँ भी आम नहीं हैं।
इन जानकारियों के लिहाज से देखा जाय, तो नयी पीढ़ी के लिए यह पुस्तक जरूर पढ़ेंकी श्रेणी में आती हैं।
नेताजी की अन्तरराष्ट्रीय गतिविधियों तथा उनके इम्फाल-कोहिमा युद्ध के बारे में पर्याप्त जानकारियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तकों में नहीं मिलती। दरअसल, नेताजी की छवि एक ऐसे नायक की बनती है, जिसने सत्ताके खिलाफ सैन्य बगावतकी थी। भले यह बगावत स्वतंत्रताके लिए थी और भले नेताजी के आदर्श एवं उनका व्यक्तिगत चरित्र बहुत ही ऊँचे दर्जे का था; फिर भी, ‘सत्ताधारीतो सत्ताधारी ही होते हैं- चाहे वे ब्रिटेन के हों, या भारत के। वे भला यह क्यों चाहने लगे कि उनकी जनता एक बागीके चरित्र से प्रभावित हो!
सच पूछा जाय, तो इसी पुस्तक में कई ऐसे प्रसंग आये हैं, जिन्हें हमारी पाठ्य-पुस्तकों में शामिल करने पर विचार किया जा सकता है।
एक और प्रश्न उठाया गया है इस पुस्तक में- क्या वास्तव में हमारी अहिंसात्मक नीतियोंसे अँग्रेजों का हृदय परिवर्तनहो गया था, जिस कारण वे देश छोड़कर चले गये? या फिर, नेताजी की सैन्य गतिविधियों तथा आई.एन.ए. सैनिकों के कोर्ट-मार्शल के बाद नागरिकों में उभरे आक्रोश और सेना में हुई बगावतों के कारण अँग्रेजों को यहाँ राज करना असम्भव लगने लगा था? समय आ गया है कि इस सवाल पर एक खुली तथा सार्थक बहस हो जानी चाहिए!
सारी पुस्तक में नेताजी के व्यक्तित्व का कुछ ऐसा भव्य रुप में उभरकर सामने आता है कि हिटलर, मुसोलिनी, तोजो, स्तालिन, चर्चिल, रूजवेल्ट इत्यादि तमाम तत्कालीन नेताओं के चरित्र फीके नजर आते हैं।
अपने व्यक्तिगत जीवन में नेताजी ने बहुत कष्ट उठाये; उनका दिल्ली चलोका सपना भी पूरा नहीं हो पाया- इन बातों की टीस को हमारे दिलों में जगाने में भी यह पुस्तक सफल रही है।
काश, कि नियति ने नेताजी को एक त्रासद नायकबनाने की अपेक्षा उन्हें स्वतंत्र भारत का पहला स्टेट्समैनबनाने का निर्णय लिया होता! ...तो आज भारत की तस्वीर कुछ और ही होती! वैसे, क्या सब खत्म हो गया है? नेताजी के सपनों के भारत का निर्माण क्या अब हम नहीं ही कर सकते? सोचना पड़ेगा...
2012, या इसके बाद भारत के पुनर्निमाण/पुनरुत्थान का अगर कोई दौर शुरु होता है, और उसे शुरु करने में इस पुस्तक की भी थोड़ी-बहुत भागीदारी होती है, तो इसमें आश्चर्य कुछ नहीं!

-डॉ. राजेन्द्र अग्रवाल
दिल्ली
23 जनवरी 2012


प्राक्कथन
(द्वितीय संस्करण से)


जय हिन्द!
प्रस्तुत पुस्तक मुख्य रुप से नेताजी की अन्तरराष्ट्रीय गतिविधियों पर केन्द्रित है; अर्थात् 17 जनवरी 1941 से 18 अगस्त 1945 तक के घटनाक्रमों पर। नेताजी से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से जुड़ी इस दौर की ऐसी बहुत-सी बातें हैं, जिनके बारे में हम अक्सर कम ही जानते हैं। जबकि हर भारतीय को- खासकर, देश की किशोर एवं युवा पीढ़ी को- इन्हें जानना चाहिए।     
17 जनवरी 1941 से पहले के कुछ घटनाक्रमों को- भूमिका के तौर पर- बहुत संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है; जबकि 18 अगस्त 1945 के बाद के सम्भावितघटनाक्रमों को विस्तार दिया गया है, ताकि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का तार्किक विश्लेषण किया जा सके। कुछ अन्य सम्बन्धित विषयों को भी छुआ गया है।   पुस्तक को वर्तमान कालमें लिखने की कोशिश की गयी है- कुछ हद तक तथा कहीं-कहीं रिपोर्ताजवाली शैली में- ताकि पढ़ते वक्त ऐसा न लगे कि हम सुदूर इतिहास की बातों को जान रहे हैं, बल्कि ऐसा लगे कि घटनायें हमारे समय में ही घट रही हों!
देश की किशोर एवं युवा पीढ़ी अगर इस पुस्तक से कुछग्रहण कर पाती है, तो पुस्तक के उद्देश्य को सफल माना जायेगा।                  

21 अक्तूबर, 2013                                             - जयदीप शेखर


तृतीय संस्करणः
      
पुस्तक को तीसरी बार सम्पादित एवं संशोधित किया गया है। इस बार का मुख्य आकर्षण है- पुस्तक के बीच-बीच में कुछ चित्रों का समावेश।

18 अगस्त 2015                                               - ज. शे.


1 comment:

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