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Sunday, December 12, 2010

5.7 नेताजी के सपने को साकार करना है...




कहते हैं कि सूर्योदय से पहले का अन्धेरा कुछ ज्यादा ही घना होता है। एक घोटालेबाज देश के रुप में बदनाम हो रहा हमारा देश शायद उसी अन्धेरे के दौर से गुजर रहा है।
गुलामी का दौर भी अन्धेरे का ही दौर था। उस वक्त नेताजी किस प्रकार के शासन के बारे में सोचते थे यह उनके निम्न कथन से जाहिर होता हैः
ब्रिटिश साम्राज्यवाद के बाद इस भारत में पहले बीस वर्ष के लिये तानाशाही राज्य कायम होनी चाहिये। एक तानाशाह ही देश से गद्दारों को निकाल सकता है।
भारत को अपनी समस्याओं के समाधान के लिये एक कमाल पाशा की आवश्यकता है।
(उल्लेखनीय है कि नेताजी कमाल अतातुर्क पाशाको अपना आदर्श मानते थे, जिनकी तानाशाही की बदौलत तुर्की के लोग आज अपने देश को दकियानूस अरब जगत का हिस्सा नहीं, बल्कि आधुनिक यूरोपीय देशों के समकक्ष मानते हैं।)
नेताजी ने ये बातें भले आजादी से बहुत पहले कही थीं, मगर आजादी के 64 वर्षों के बाद आज इन कथनों की सार्थकता अचानक बढ़ गयी है।
नेताजी के कथन में जिन्हें गद्दारकहा गया हैं, आज भी वे हमारे बीच भ्रष्ट राजनेता, भ्रष्ट उच्चाधिकारी, भ्रष्ट पूँजीपति और माफिया सरगना के रुप में मौजूद हैं- इसमें कोई दो राय नहीं है।
समय आ गया है कि नेताजी-जैसा कोई व्यक्ति देश की सत्ता सम्भाले, गद्दारों को (व्यवस्था से) निकाल बाहर करे, देश की समस्याओं का समाधान करते हुए आदर्श लोक’-तंत्र या जन’-तंत्र की स्थापना करे और विश्व के मानचित्र पर देश को वह स्थान दिलाये, जिसका वह हकदार है।
अगर यह सब कुछ कुछ वर्षों के एकच्छत्रीयलोकतंत्र (राष्ट्रपति प्रणाली-जैसी, या तानाशाही- डिक्टेटरशिप- ही सही) से भी आता है, तो हर्ज क्या है?
वयोवृद्ध अर्थशास्त्री डॉ. अरूण घोष के इस कथन पर नजर डालिये, जिससे पता चलता है कि आज हमारा संसदीयलोकतंत्र (अब तो गठबन्धन अनिवार्य हो चला है) कोई बहुत अच्छे ढंग से काम नहीं कर रहा हैः  
मैं तो केवल सर्वनाश देख सकता हूँ। भविष्य में क्या होगा, इसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकता। पर समाज विचलित हो रहा है। जनता की नाराजगी बढ़ रही है। मेरा मानना है कि संसद वर्तमान स्थिति को रोकने की हालत में नहीं है। सभी पार्टियाँ इन नीतियों (उदारीकरण) की समर्थक हैं, और सांसदों में सड़क पर आने का दम नहीं है।
मुझे तो लगता है कि एक लाख लोग अगर संसद को घेर लें, तो शायद कुछ हो।
              डॉ. अरूण घोष ने ये बातें दैनिक जनसत्ताको दिये गये अपने साक्षात्कार में कही थी। यह साक्षात्कार 30 जुलाई 1998 को प्रकाशित हुआ था।
***
         अन्त में, गाँधीजी के विचारों को पढ़ा जाय, जिसे पढ़कर ऐसा लगेगा, मानो सात-आठ दशकों पहले ही उनकी अन्तर्दृष्टि ने हमारे आज के संसदीय लोकतंत्रको देख लिया थाः
              ”ऐसा सामान्यतया माना जाता है कि संसद-सदस्य पाखण्डी एवं स्वार्थी होते हैं। सभी अपने छोटे-छोटे हितों की सोचते हैं। सदस्य बिना सोचे ही अपनी पार्टी को संसद में वोट देते हैं। तथाकथित अनुशासन ही उन्हें बाँधे रखता है। अपवाद स्वरुप अगर कोई संसद-सदस्य स्वतंत्र वोट करता है, तो उसे विश्वासघाती मान लिया जाता है।
                ”प्रधानमंत्री संसद के कल्याण से ज्यादा अपनी शक्ति के लिए चिन्तित रहता है। उसकी ऊर्जा पार्टी की सफलता प्राप्त कराने में ही लगी रहती है। उसे यह चिन्ता नहीं रहती है कि संसद को सही काम करना चाहिए।
              ”अगर वे (प्रधानमंत्री) ईमानदार माने जाते हैं, तो इसलिए क्योंकि वे वह नहीं लेते, जिसे सामान्यतया घूस माना जाता है। लेकिन कुछ दूसरी प्रभावी विधियाँ भी हैं। वे अपने हितों को साधने के लिए लोगों को पुरस्कार एवं सम्मान के रूप में घूस देते हैं। मैं यह कहने को मजबूर हूँ कि वे न तो सच्चे ईमानदार हैं और न ही उनकी अन्तरात्मा जीवित है।
                (यह कथन इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय’- ‘इग्नू’- की पाठ्य-पुस्तक आधुनिक भारतीय राजनीतिक विचारधाराके खण्ड- 3 (EPS- 3), पृष्ठ- 10 से उद्धृत है। नेताजी का कथन भी इसी पुस्तक से लिया गया है।)
***
सच पूछा जाय, तो देश को इस वक्त एक ऐसे स्टेट्समैनकी जरुरत है, जो 1. दस वर्षों के लिए देश में तानाशाही कायम करे; 2. मार्गदर्शन के लिए विभिन्न विषयों के विद्वानों/विशेषज्ञों का एक मंत्रीपरिषद बनाये, और 3. गरीबों एवं आम लोगों के लिए फूल से भी कोमलतथा अमीरों एवं खास लोगों के लिए वज्र से भी कठोरनीतियों को अनुसरण करते हुए निम्न कार्य करे-
·         1943 में 21 अक्तूबर के दिन सिंगापुर में नेताजी सुभाष द्वारा स्थापित स्वतंत्र भारत की अन्तरिम सरकारको वैधानिक मान्यता दे।
·         सत्ता-हस्तांतरण की शर्तों को रद्द करे।
·         राष्ट्रमण्डल (कॉमनवेल्थ) की सदस्यता का परित्याग करे।
·         नेताजी सुभाष को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधान का सम्मान दे।
·    1935 (बल्कि 1858) के अधिनियम पर आधारित वर्तमान संविधान के स्थान पर भारत-भारतीय-भारतीयतापर आधारित एक नया संविधान लागू करे।
·         देश के सभी बड़ेभ्रष्टों को निकोबार के किसी टापू पर कैद करे।
·         सरकारी खजाने की लूटी/बर्बाद की गयी राशि की पाई-पाई वसूले।
·         विश्व-बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन द्वारा संचालित शोषण-दोहन-उपभोगपर आधारित वर्तमान विश्व अर्थनीति के चंगुल से देश को मुक्त कराये।
·         ‘समता-पर्यावरणमित्रता-उपयोगपर आधारित जनकल्याणकारी नीतियों को लागू करे।
·      1:15 के अनुपात पर नया सरकारी वेतनमान बनाकर इसी वेतनमान पर बहालियाँ करके नयी भारतीय राष्ट्रीय सेना, पुलिस, प्रशासन, न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, इत्यादि व्यवस्था का गठन करे।
·         हर नागरिक को शिक्षित बनाये।
·         हर हाथ को रोजगार दे।
·         हर देशवासी के दिल में भारतीयताके अहसास को जगाये।
·   भारतीय प्रतिभा, भारतीय श्रमशक्ति तथा भारतीय संसाधनों के बल पर भारत को खुशहाल, स्वावलम्बी तथा शक्तिशाली राष्ट्र बनाये।
  *****
"नाज़-ए-हिन्द सुभाष" का
eBook संस्करण  ।  पुस्तक संस्करण

17 comments:

  1. नेताजी बहुत दूरदर्शी थे..

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  2. badiya post...
    mere blog par bhi kabhi aaiye waqt nikal kar..
    Lyrics Mantra

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  3. जबरजस्त ब्लाग !!!!!!

    आभार

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  4. Neta ji Subhash Chandra Bose Jayanti (23 Jan) par vishesh
    by Kaviyugal Saurabh Anamika on Saturday, 22 January 2011 at 13:13
    नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती पर मेरे शब्द-सुमन उनके पुनीत चरणों में...मेरी कविता "नेता जी सुभाष चन्द्र बोस" के कुछ अंश...


    आजादी के समय ब्रिटिश हुकूमत के गवर्नर लोर्ड माउन्ट बेटन और नेहरु जी के बीच एक अनुबंध हुआ जिसमे नेता जी को "युद्ध-अपराधी" घोषित कर जिन्दा या मुर्दा अंग्रेजो को सौंपने की शर्त रखी गई...तब कहता हूँ....


    ऐसे अनुबंध छिपे कागजों की पर्त में
    जिनमे सुभाष बिके आजादी की शर्त में
    मौन दस्तावेजों की वो स्याही चीखती रही
    उन्हें पास आती मात्र सत्ता दीखती रही
    नींव की जो शख्स ईंट बुनियादी हो गया
    आजादी मिली तो युद्ध अपराधी हो गया
    जिसके मुकाबले में आसमान बोना था
    अपराधी हुआ जिसे राष्ट्र-पिता होने था


    अनुबंध के वो प्रष्ठ फाड़े जाने थे तभी
    आँखों में गोरो के पेन गाडे जाने थे तभी
    बोला होता बेटन से नेहरु जी ने डांट कर
    देखा जो सुभाष को तो रख देंगे काट कर
    शर्म से वो कागज़ भी आंख मीचता रहा
    किन्तु उन्हें दिल्ली वाला तख्त खींचता रहा
    ऐसे शासकों का वन-वास मांगता हैं देश
    एक बार फिर से सुभाष मांगता हैं देश


    545 सांसद मिलकर एक देश को एक करार के लिए सहमत नहीं कर पा रहे हैं....वहां गुलाम देश के एक गुलाम भारतीय ने तीन-तीन मुल्कों के राष्ट्राध्यक्षों को ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध युद्ध के लिए तयार किया था.....सोचिये यदि आज सत्ता बोस जैसे किसी नेता के हाथ में होती तो हमारी स्थिति क्या रही होती......


    माँगा नहीं दिल्ली वाला राज भी सुभाष ने
    चाहा नहीं मोतियों का ताज भी सुभाष ने
    नेता जी का सपना था बेडियों को तोड़ना
    भारत के नाम को स्वाधीनता से जोड़ना
    भारती के आंसुओं से आँख जिसकी खारी थी
    माँ की हर चोट जिसकी आत्मा पे भरी थी
    बोस एक नाम हैं अंधेरों में चराग का
    गुलामी के आंसुओं में दबी हुई आग का


    1945 में एक विमान दुर्घटना में नेता जी को मृत घोषित किया गया. 1947 को हुए अनुबंध में फिर ये शर्त क्यों रखी गई की नेता जी भारत आते हैं तो उन्हें अंग्रेजी हुकूमत को सौंपना होगा.....इसका आशय यही हैं की अंग्रेज भी जानते थे की नेता जी जीवित हैं और हमारे पूर्व प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरु जी भी जानते थे की सुभाष जिन्दा हैं.....फिर ये विमान दुर्घटना का झूठ क्यों...???


    कहते हो बैठे थे सुभाष जिस विमान में
    हो गया हैं ध्वस्त वो विमान ताइवान में
    सूर्य के समक्ष वक्ष तान घटा छा गई
    भाग्य की कलम स्याही से कहर ढा गई
    दिव्य क्रांति-ज्योत को अँधेरा आके छल गया
    बोलते हो सूर्य-पुत्र चिंगारी से जल गया
    आपसे वो जली हुई लाश मांगता हैं देश
    एक बार फिर से सुभाष मांगता हैं देश


    -डॉ.सौरभ जैन 'सुमन'
    Ph: +91 9412200143
    email: kaviyugal@yahoo.com

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  5. BAHUT BADHIYA LEKHAN KI KSHAMTA HAI AAPKI.
    LEKIN KUCH HAI JO ACHCHA NAHI LAGA- IF AND BUT.

    KAHAWAT HAI-
    'AGAR PHUA(AUNTI) KO TOTI HOTA TO CHACHA HOTE'

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  6. एक बार फिर से सुभाष मांगता हैं देश


    aapke sath suman ji ko tah-e-dil se bandhaii is shashakt or dilkash lekhan par

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  7. साथियों,
    जय हिन्द!
    ‘TOTAL PAGEVIEWS’ बताता है 7,000 साथी इस चिट्ठे पर आ चुके हैं... मैं हृदय से सबके प्रति आभार व्यक्त करता हूँ...
    ईति.

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  8. इस ब्लॉग के लिए आपका ब्लॉग जगत में एक अलग उच्च स्थान होना चाहिए ... बहुत बहुत बधाई ... इस ब्लॉग को फोलो कैसे करूँ ?

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  9. इन्द्रनील जी,
    जय हिन्द.
    गाजियाबाद के अरूण रॉय जी ने भरोसा दिलाया है कि फरवरी'12 में दिल्ली में होने वाले 'विश्व पुस्तक मेले' (जहाँ उनकी प्रकाशन संस्थान को स्टॉल भी मिल चुका है) से पहले वे इस लेखमाला को पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर देंगे. मैं इस ब्लॉग पर पुस्तक छपने की सूचना तो दूँगा ही; मेरी कोशिश होगी कि सभी टिप्पणीकर्ताओं को भी ईमेल से सूचित कर सकूँ.
    ईति.

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  10. बहुत बढ़िया भाई ,जय हिंद !
    आपको शुभकामनाएं !

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  11. पञ्च दिवसीय दीपोत्सव पर आप को हार्दिक शुभकामनाएं ! ईश्वर आपको और आपके कुटुंब को संपन्न व स्वस्थ रखें !
    ***************************************************

    "आइये प्रदुषण मुक्त दिवाली मनाएं, पटाखे ना चलायें"

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  12. ये वर्तमान है भविष्य कैसा होगा। नेताजी को पहले से ही पता था

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  13. सार्थक पोस्ट , नेताजी को नमन

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  14. इस अँधेरी रात की सुबह कभी तो होगी....

    परनाम शहीदां नू

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  15. बढ़िया प्रस्तुति , इस राष्ट्र नायक को शत-शत नमन !

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  16. apki koshish pure desh ko malum honi chahiye .....sadar naman nete ji ko

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