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Friday, December 3, 2010

5.4 गाँधी-नेहरू और सुभाष



पढ़िये, 14 जुलाई 1940 को अपने साप्ताहिक हरिजन सेवकके दूसरे अंक में गाँधीजी क्या लिखते हैं:
वर्धा से लौटते हुए नागपुर स्टेशन पर एक नवयुवक ने यह सवाल पूछा कि कार्य-समिति ने सुभाष बाबू की गिरफ्तारी की तरफ क्यों कुछ ध्यान नहीं दिया? चूँकि सोमवार का दिन था, मेरा मौन चल रहा था। मैंने कुछ भी जवाब नहीं दिया। मगर नवयुवक का यह प्रश्न मुझे ठीक लगा। मैंने उसे ध्यान में रख लिया। मेरे दिल में जरा भी शक नहीं है कि सैकड़ों लोग यही सवाल अपने दिल में पूछ रहे होंगे। सुभाष बाबू दो बार लगातार काँग्रेस के राष्ट्रपति चुने जा चुके हैं। अपनी जिन्दगी में उन्होंने भारी आत्मबलिदान किया है। वह एक जन्मजात नेता हैं। मगर सिर्फ इस वजह से कि उनमें ये सब गुण हैं, यह साबित नहीं होता कि उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ कार्य-समिति अपनी आवाज ऊँची करे। हाँ, यदि गुण-दोष का विचार करने के बाद कार्य-समिति को ऐसा लगे कि अमुक गिरफ्तारी निन्दा के लायक है, तो वह जरूर उसकी ओर अपना ध्यान देगी। मगर सुभाष बाबू ने काँग्रेस की इजाजत से कानून को भंग नहीं किया है। उन्होंने तो कार्य-समिति की आज्ञा का भी छाती-ठोंक उल्लंघन किया है। ...इसलिए सुभाष बाबू ने जो कदम उठाया है, अगर उसके बारे में कार्य-समिति कोई कार्रवाई करती, तो वह सिर्फ यही हो सकती थी कि वह अपनी नापसन्दगी प्रकट करे।
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अनुमान लगाया जा सकता है कि गाँधीजी अच्छी तरह जानते होंगे कि बात चाहे देशभक्ति की हो या आत्मबलिदान की; प्रतिभा की हो या नेतृत्व की क्षमता की, हर मामले में सुभाष नेहरू से बीस पड़ता है। वे यह भी जानते होंगे कि आजादी के बाद नेहरू के मुकाबले सुभाष ही देश को बेहतर शासन-प्रशासन दे सकता है।
इसके बावजूद गाँधीजी नेताजी के प्रति सौतेला-सा भाव रखते हैं और नेहरूजी को (1941 में) अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हैं।
ऐसा वे सिर्फ वैचारिक मतभेदके कारण करते हैं। गाँधीजी जहाँ अँग्रेजों का हृदय-परिवर्तन करना चाहते थे, वहीं नेताजी अँग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाना चाहते थे। अन्तिम लक्ष्य दोनों का एक ही था- आजादी या स्वराज!
आजादी या स्वराज के अन्तिम लक्ष्य, यानि साध्यको पाने के लिए नेताजी किसी भी साधनको अपनाने के तैयार थे। उनके कथनानुसार, देश की आजादी के लिए अगर शैतान से भी हाथ मिलाना पड़े, तो वे मिलायेंगे। (सन्दर्भः हिटलर-मुसोलिनी से मैत्री।) इसके मुकाबले गाँधीजी साधन की पवित्रता पर जोर देते थे। उनका स्पष्ट कथन थाः
मैं अपने देश या अपने धर्म तक के उद्धार के लिए सत्य और अहिंसा की बलि नहीं दूँगा। वैसे, इनकी बलि देकर देश या धर्म का उद्धार किया भी नहीं जा सकता।
इस वैचारिक मतभेदके बावजूद नेताजी गाँधीजी के प्रति पिता’-जैसा सम्मान मन में बनाये रखते हैं। वे गाँधीजी को राष्ट्रपिताकहकर सम्बोधित करते हैं- आजाद हिन्द रेडियो पर। नेताजी यह भी कहते हैं कि एकबार देश आजाद हो जाय, फिर अहिंसा की नीति पर हम चलेंगे। मगर गाँधीजी इस वैचारिक मतभेदके चलते नेताजी के प्रति पुत्रवाला स्नेह दिखाने से शायद चूक गये- कम-से-कम वक्त परतो चूक ही गये! (1944 के इम्फाल युद्ध के समय नेताजी बहुत ही नाजुक स्थिति में थे- मगर किसी भारतीय नेता ने उनका समर्थन नहीं किया...)
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देखा जाय, तो स्वतंत्र भारत की नियति तय करने में गाँधीजी के तीन फैसले अहम भूमिका निभाते हैं-
1. 1939 में नेताजी को काँग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए वे मजबूर करते हैं;
2. 1944 में इम्फाल-कोहिमा युद्ध के दौरान नेताजी के समर्थन में जनता को आन्दोलित होने का आह्वान वे नहीं करते, और-
3. 1946 में काँग्रेस के अध्यक्ष पद पर वे सरदार पटेल के स्थान पर नेहरूजी को बैठाते हैं।
पहले दो विन्दुओं का विस्तार से जिक्र यथास्थान हो चुका है, यहाँ तीसरे विन्दु के विस्तार में चलते हैं। 1946 में जो काँग्रेस का अध्यक्ष बनेगा, वही अगले साल स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री बनेगा- यह तय है। इसलिए इस बार अध्यक्ष चुनने से पहले काँग्रेस की 16 प्रान्तीय समितियों से प्रस्ताव मँगवाये जाते हैं। उम्मीदवार के रूप में एक तरफ नेहरूजी का करिश्माई व्यक्तित्व है, तो दूसरी तरफ सरदार पटेल का कर्मठ व्यक्तित्व। गाँधीजी पाँच साल पहले ही दोनों में से नेहरूजी को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर चुके हैं। इसके बावजूद परिपक्वता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए 16 में से 13 प्रान्तीय समितियाँ सरदार पटेल का नाम प्रस्तावित करती हैं। केन्द्रीय समिति की बैठक में गाँधीजी नेहरूजी से पूछते हैं- दूसरास्थान स्वीकार है? मारे शर्म और क्रोध के नेहरूजी का चेहरा तमतमा कर लाल हो जाता है। अब गाँधीजी यही सवाल सरदार पटेल से करते हैं- उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। ...नेहरूजी अध्यक्ष बनते हैं, ...एक तरफ राजभवन से (जाने वाले) वायसराय वावेल और दूसरी तरफ सिंगापुर से (आने वाले) वायसराय माउण्टबेटन उन्हें आमंत्रित करते हैं, ...स्वतंत्र भारत की नियति तय हो जाती है... । 
गाँधीजी के इन फैसलों का कितना नफा या नुकसान हमारे देश को उठाना पड़ा- इसका आकलन हम आज नहीं कर सकते। आने वाली दो-एक शताब्दी के बाद क्षमाहीन और निर्मम कालइसका आकलन करेगा!
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क्या ऐसा नहीं लगता कि इस आधुनिक महाभारत में गाँधीजी श्रीकृष्ण, नेहरूजी अर्जुन और नेताजी कर्ण की भूमिका में हैं?
(प्रसंगवश, यह स्पष्ट कर दिया जाय कि महाभारत में नायककी भूमिका दो ने ही अदा की थी- एक कर्ण और दूसरे अभिमन्यु ने, अर्जुन का ऐसा कोई कार्य नहीं है इस युद्ध में कि उसे नायकमाना जाय। वह विजयीबना- मगर भगवान श्रीकृष्णके कारण!)
विश्वयुद्ध की परिस्थितियाँ नेताजी को दुर्योधन-दुःशासन रुपी हिटलर-मुसोलिनी का मित्र बना देती है। हालाँकि कुछ फर्क भी हैं दोनों महाभारत में- जैसे, यहाँ शकुनी रुपी माउण्टबेटन अर्जुन को बुद्धी देते नजर आ रहे हैं! ....महाभारत की कुन्ती तो फिर भी कर्ण को अपना बेटा स्वीकार कर लेती है, मगर यहाँ कुन्ती रुपी काँग्रेस अब तक अपने अधिवेशनोंमें नेताजी की तस्वीर नहीं लगाती- जबकि नेताजी दो बार काँग्रेस के अध्यक्ष चुने जा चुके हैं!
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नेहरूजी के प्रति गाँधीजी की आसक्ति आजादी के बाद देश के कोई काम नहीं आती है। प्रधानमंत्री बनने के बाद नेहरूजी गाँधीजी के एक भी सिद्धान्त को नहीं अपनाते हैं। कृषि को नजरअन्दाज कर उद्योग-धन्धों में पैसा खर्च किया जाता है; कुटीर एवं लघु उद्योगों के बजाय मशीनीकरण का जाल फैलाया जाता है; स्थानीय स्तर के शासन-प्रशासन को मजबूत करने के बजाय सत्ता का भारी केन्द्रीकरण किया जाता है; जनता में आधा पेट खाकर भी देश का पुनर्निर्माण करेंगे’- जैसी भावना भरने के बजाय कर्ज लेकर घी पीनेकी मानसिकता तैयार की जाती है (जरा सोचिये, जब देश आजाद हुआ, तब एक डॉलर एक रूपये में मिलता था- विश्व बैंक से कर्ज पाने के लिए रूपये का पहली बार अवमूल्यन किया गया- तब से अब तक यह प्रक्रिया थम नहीं पायी है- ऊपर से, हम ऋण-चक्र में फँस चुके हैं!); पुलिस एवं प्रशासन के लोगों को यह समझाने की कोशिश नहीं की जाती है कि देश के नागरिक अब उन्हीं के भाई-बन्धु हैं- शासितनहीं; ...कहने का तात्पर्य, लगभग हर काम गाँधीजी के सिद्धान्तों के उलट किया जाता है।
गाँधीजी जहाँ आजाद भारत की नींव को मजबूत बनाना चाहते थे, वहीं नेहरूजी बिना नींव के ही आलीशान गुम्बद बनाने में जुट जाते हैं!
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नेताजी ने इण्डियन सिविल सर्विसेज’ (तब का यह आई.सी.एस. ही अब आई.ए.एस. कहलाता है) की परीक्षा में दूसरा स्थान प्राप्त किया था। यह उनके प्रतिभाशाली होने का परिचायक है। इसके अलावे, उनका व्यक्तित्व शानदार था, भाषण कला जानदार थी और नेतृत्व की क्षमता अद्भुत थी। उनकी देशभक्ति के बारे में कुछ कहना सूरज को दीया दिखाने-जैसा है। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी वे भारत के स्वतंत्रता सेनानीके रुप में प्रसिद्ध थे।
कुछ इन्हीं कारणों से सम्भवतः नेहरूजी के मन में नेताजी के प्रति एक ग्रन्थी-सी बन गयी होगी। इसके अलावे, माउण्टबेटन से उन्होंने कुछ समझौते भी कर लिए थे। फलस्वरुपआजादी के बाद न तो वे नेताजी को स्वतंत्रता-सेनानीका दर्जा दिलवाते हैं, और न ही आधुनिक भारत के इतिहास के पन्नों में स्वतंत्रता-संग्राम में नेताजी तथा उनके आजाद हिन्द फौज के योगदान का समुचित जिक्र होने देते हैं।
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दुनिया में बहुत कम ही नेता ऐसे हुए हैं, जिनके बारे में दुनिया का कोई भी व्यक्ति कभी कोई अपशब्द नहीं बोल सकता है- नेताजी उनमें से एक हैं। दुनिया के किसी भी देश का नागरिक नेताजी के प्रति सम्मान से सर झुकाता है- यह हमारे देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।
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"नाज़-ए-हिन्द सुभाष" का

9 comments:

  1. साथियों,
    जय हिन्द.
    मैं बहुत दिनों तक उधेड़-बुन में था कि इस अध्याय को लिखूँ या नहीं. कभी-कभी लगता था- महापुरुषों के बारे में टीका-टिप्पणी- खासकर तुलनात्मक- नहीं करनी चाहिए. जैसे कागज पर लिख-लिख कर हम फाड़ते हैं, वैसे, कई बार टाईप करके भी मैं प्रकाशित करने से हिचक जाता था. अब जब लगा कि अन्तराल कुछ ज्यादा ही हो रहा है, तो जल्दीबाजी में कुछ लिखकर मैं पोस्ट कर रहा हूँ.
    देखा जाय- 'मूसल' सहने को मैं तैयार हूँ.
    ईति.
    -जयदीप

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  2. जयदीप भाई ,
    जय हिंद !

    यह तुलना तो होनी ही चाहिए ... इस में कोई बुराई नहीं है ... अगर के भारत आजाद है और हम सब आजाद है तो हमारी सोच को भी अब आजाद होना होगा ... कब तक आखिर कब तक वही रटे रटाये वाक्य हम बोलते और पढ़ते रहेंगे ... ''आज़ादी हम को गांधी ने अहिंसा के बल पर दिलवाई'' ... बहुत हुआ ... अब बस करो यह नाटक !! जागो भारत जागो ... और सच को जानो !

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    1. GALT GADI JE SURUAT KI PAR AAJADI CANDHASEKHAR AAJAD ,BHAGT SIHA SUKHDEV AUR DAES BHAKTO NE DILAAI HE

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  3. जयदीप जी, बिल्कुल सही लिखा है, यूं ही लिखते रहें. एक पुस्तक का आकार दें तो और भी अच्छा रहेगा..

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  4. स्वतन्त्र संग्राम में नेताजी की स्थिति तो कर्ण वाली मानी जा सकती हैं लेकिन गांधी जी को श्रीकृष्ण और नेहरू को अर्जुन कहा जाना देश के अमर शहीदों का अपमान करने जैसा हैं । भगवान श्रीकृष्ण ने तो अर्जुन के माध्यम से खण्ड - खण्ड हुये भारत को अखण्ड भारत बनाया था । और इधर नेहरू - गांधी जी ने अपनी साम्प्रदायिक तुष्टिकरण की नीतियों से अखण्ड भारत को विभाजित करा दिया ।
    गांधी जी ने खिलापत आन्दोलन ( जिसका भारत या भारत के मुसलमानों से कोई भी सम्बन्ध नहीं था । ) को अपना नेतृत्व प्रदान कर पाकिस्तान का आधार तो जिन्ना से भी पहले रख दिया था ।
    सुन्दर जानकारी
    नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को कोटि - कोटि प्रणाम
    www.vishwajeetsingh1008.blogspot.com

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  5. स्वतन्त्र संग्राम में नेताजी की स्थिति तो कर्ण वाली नहीं बल्कि श्रीकृष्ण जैसा हैं, -जैसे की १९४१ में ही टैगोर ने स्पष्ट रुप में कह दिये थे, जिसकी डक्यूमेन्ट शान्ति-निकेतन से गांधी-नेहरू ने गायब करवा दिये थे। पर उसकी असली कापी अभी मिल गयी है। गांधी को शकुनी मानी जा सकती हैं। और नेहरू को दुर्योधन कहना उनकी दुरात्मा की शान्ति के लिए उचित होगा। भगवान श्रीकृष्ण ने तो अर्जुन के माध्यम से खण्ड - खण्ड हुये भारत को अखण्ड भारत बनाया था । नेहरू-गांधी ने अपनी खानदानी राज कायम करने के लिए अखण्ड भारत को विभाजित करा दिया । गांधी जी ने खिलापत आन्दोलन ( जिसका भारत या भारत के मुसलमानों से कोई भी सम्बन्ध नहीं था । ) को अपना नेतृत्व प्रदान कर पाकिस्तान का आधार तो जिन्ना से भी पहले रख दिया था, और सुभाष के बाद जिन्ना जैसे निरपेक्ष असाम्प्रदायिक योग्य व्यक्ति को भयानक खतरनाक निष्ठुर, साम्प्रदायिक, देशद्रोही, इसलाम-के-भविष्य-नाशी, हिन्दुओं के असुर बना दिया। … अल्लाह के वो असली बंदे, रसूल-ए-हिन्द, सन्त-सुभाष को बे-तोड़ हिन्दी लाल-सलाम । नेताजी सुभाष (चन्द्र बोस X) को शत कोटि गूना कोटि प्रणाम।

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    1. रणेन्द्र जी, आपकी बात से सहमत हूँ. पहले भी किसी साथी ने गाँधीजी को श्रीकृष्ण बताये जाने पर आपत्ति की थी. लगता है, यह तुलना नहीं करनी चाहिए थी मुझे. फिर भी, एकबार सफाई देना उचित होगा.
      मेरी नजर में महाभारत में "नायक" दो ही हैं- पहले- कर्ण; दूसरे- अभिमन्यु. अर्जुन को किसी भी नजरिये से मैं "नायक" (Hero)नहीं मानता. ऐसी कौन-सी घटना है महाभारत में, जिससे अर्जुन का नायकत्व उभरकर आता है? शायद कोई नहीं. जैसे श्रीकृष्ण की मेहरबानी ने अर्जुन विजयी हुआ, वैसे ही गाँधीजी की मेहरबानी से आधुनिक महाभारत में नेहरूजी विजयी हुए. गाँधीजी ने बाकायदे सारथी बनकर नेहरूजी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचाया था! जैसे कृष्ण की सलाह पर अर्जुन ने उस वक्त कर्ण को मारा, जब कर्ण कीचड़ में धँसे अपने रथ के पहियों को निकाल रहे थे, वैसे ही गाँधी-नेहरू ने मिलकर कोहिमा-इम्फाल युद्ध के दौरान नेताजी के समर्थन में आखिरी आन्दोलन के लिए जनता से आह्वान नहीं किया- नेताजी को अकेले छोड़ दिया... (रणेन्द्र जी, शायद फोन पर एकबार आपसे लम्बी बातचीत हो चुकी है... आपके पास कोई ऐसी जानकारी है नेताजी के बारे में, जिसके बारे में सब नहीं जानते हैं. क्या आप उसे बाँटना नहीं चाहेंगे..?)

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  6. जयदीप भाई
    सादर प्रणाम,
    नेता जी के संस्कार के कुछ चित्र जो मुझे स्वीडन से प्राप्त हुए है, कृपया मेरे ब्लौग http://subhashafter1945.blogspot.com/ पर देखें, इन्हें मैंने अपनी वेबसाईट www.deathofsubhashbose.com पर भी डाला है!

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    1. जय हिन्द रन्धावा साहब,
      मैं कृतज्ञ हूँ कि आपने मुझे इस लायक समझा और इस ब्लॉग पर इसकी जानकारी दी.
      बहुत-बहुत आभार.

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