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Monday, November 22, 2010

5.3 ऐसे आयी आजादी

Rakesh Mishra said...
Great note.... worth reading 1000 times.... 


कृपया निम्न तथ्यों को बहुत ही ध्यान से तथा मनन करते हुए पढ़ियेः
1. 1942 के भारत छोड़ोआन्दोलन को ब्रिटिश सरकार कुछ ही हफ्तों में कुचल देती है।
2. 1945 में ब्रिटेन विश्वयुद्ध में विजयीदेश के रुप में उभरता है।
3. ब्रिटेन न केवल इम्फाल-कोहिमा सीमा पर आजाद हिन्द फौज को पराजित करता है, बल्कि जापानी सेना को बर्मा से भी निकाल बाहर करता है।
4. इतना ही नहीं, ब्रिटेन और भी आगे बढ़कर सिंगापुर तक को वापस अपने कब्जे में लेता है।
5. जाहिर है, इतना खून-पसीना ब्रिटेन भारत को आजाद करनेके लिए तो नहीं ही बहा रहा है। अर्थात् उसका भारत से लेकर सिंगापुर तक अभी जमे रहने का इरादा है।
6. फिर 1945 से 1946 के बीच ऐसा कौन-सा चमत्कार होता है कि ब्रिटेन हड़बड़ी में भारत छोड़ने का निर्णय ले लेता है?
                हमारे शिक्षण संस्थानों में आधुनिक भारत का जो इतिहास पढ़ाया जाता है, उसके पन्नों में सम्भवतः इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलेगा। हम अपनी ओर से भी इसका उत्तर जानने की कोशिश नहीं करते- क्योंकि हम बचपन से ही सुनते आये हैं- दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल।इससे आगे हम और कुछ जानना नहीं चाहते।
प्रसंगवश- 1922 में असहयोग आन्दोलनको जारी रखने पर जो आजादी मिलती, उसका पूरा श्रेय गाँधीजी को जाता। मगर चौरी-चौरामें हिंसाहोते ही उन्होंने अपना अहिंसात्मकआन्दोलन वापस ले लिया, जबकि उस वक्त अँग्रेज घुटने टेकने ही वाले थे! दरअसल गाँधीजी सिद्धान्त व्यवहारमें अन्तर नहीं रखने वाले महापुरूष रहे हैं, इसलिए उन्होंने यह फैसला लिया। हालाँकि एक दूसरा रास्ता भी था- कि गाँधीजी स्वयं अपने आप कोइस आन्दोलन से अलग करते हुए इसकी कमान किसी और को सौंप देते। मगर यहाँ अहिंसा का सिद्धान्तभारी पड़ जाता है- देश की आजादीपर। 
                यहाँ हम 1945-46 के घटनाक्रमों पर एक निगाह डालेंगे और उस चमत्कारका पता लगायेंगे, जिसके कारण और भी सैकड़ों वर्षों तक भारत में जमे रहने की इच्छा रखने वाले अँग्रेजों को जल्दीबाजी में फैसला बदलकर भारत से जाना पड़ा।
प्रसंगवश- जरा अँग्रेजों द्वारा भारत में किये गये निर्माणोंपर नजर डालें- दिल्ली के संसद भवनसे लेकर अण्डमान के सेल्यूलर जेलतक- हर निर्माण 500 से 1000 वर्षों तक कायम रहने एवं इस्तेमाल में लाये जाने के काबिल है! 
                ***
लालकिले के कोर्ट-मार्शल के खिलाफ देश के नागरिकों ने जो उग्र प्रदर्शन किये, उससे साबित हो गया कि जनता की सहानुभूति आजाद हिन्द सैनिकों के साथ है।
इस पर भारतीय सेना के जवान दुविधा में पड़ जाते हैं।
फटी वर्दी पहने, आधा पेट भोजन किये, बुखार से तपते, बैलगाड़ियों में सामान ढोते और मामूली बन्दूक हाथों में लिये बहादूरी के साथ भारत माँ की आजादी के लिएलड़ने वाले आजाद हिन्द सैनिकों को हराकर एवं बन्दी बनाकर लाने वाले ये भारतीय जवान ही तो थे, जो महान ब्रिटिश सम्राज्यवाद की रक्षा के लिएलड़ रहे थे! अगर ये जवान सही थे, तो देश की जनता गलत है; और अगर देश की जनता सही है, तो फिर ये जवान गलत थे!
सेना के भारतीय जवानों की इस दुविधा ने आत्मग्लानि का रुप लिया, फिर अपराधबोध का और फिर यह सब कुछ बगावत के लावे के रुप में फूटकर बाहर आने लगा।
फरवरी 1946 में, जबकि लालकिले में मुकदमा चल ही रहा था, रॉयल इण्डियन नेवी की एक हड़ताल बगावत में रुपान्तरित हो जाती है। कराची से मुम्बई तक और विशाखापत्तनम से कोलकाता तक जलजहाजों को आग के हवाले कर दिया जाता है। देश भर में भारतीय जवान ब्रिटिश अधिकारियों के आदेशों को मानने से इनकार कर देते हैं। मद्रास और पुणे में तो खुली बगावत होती है। इसके बाद जबलपुर में बगावत होती है, जिसे दो हफ्तों में दबाया जा सका। 45 का कोर्ट-मार्शल करना पड़ता है।
यानि लालकिले में चल रहा आजाद हिन्द सैनिकों का कोर्ट-मार्शल देश के सभी नागरिकों को तो उद्वेलित करता ही है, सेना के भारतीय जवानों की प्रसिद्ध राजभक्तिकी नींव को भी हिला कर रख देता है।
जबकि भारत में ब्रिटिश राज की रीढ़ सेना की यह राजभक्तिही थी!
***
बिल्कुल इसी चीज की कल्पना नेताजी ने की थी, जब (मार्च’44 में) वे आजाद हिन्द सेना लेकर इम्फाल-कोहिमा सीमा पर पहुँचे थे। उनका आह्वान था- जैसे ही भारत की मुक्ति सेना भारत की सीमा पर पहुँचे, देश के अन्दर भारतीय नागरिक आन्दोलित हो जायें और ब्रिटिश सेना के भारतीय जवान बगावत कर दें।
इतना तो नेताजी भी जानते होंगे किः
1. सिर्फ तीस-चालीस हजार सैनिकों की एक सेना के बल पर दिल्ली तक नहीं पहुँचा जा सकता, और
2. जापानी सेना की पहलीमंशा है- अमेरिका द्वारा बनवायी जा रही (आसाम तथा बर्मा के जंगलों से होते हुए चीन तक जानेवाली) लीडो रोडको नष्ट करना; भारत की आजादी उसकी दूसरीमंशा है।
ऐसे में, नेताजी को अगर भरोसा था, तो भारत के अन्दर नागरिकों के आन्दोलनएवं सैनिकों की बगावतपर। ...मगर दुर्भाग्य, कि उस वक्त देश में न आन्दोलन हुआ और न ही बगावत।
इसके भी कारण हैं। 
पहला कारण, सरकार ने प्रेस पर पाबन्दी लगा दी थी और यह प्रचार (प्रोपागण्डा) फैलाया था कि जापानियों ने भारत पर आक्रमण किया है। सो, सेना के ज्यादातर भारतीय जवानों की यही धारणा थी।
दूसरा कारण, फॉरवर्ड ब्लॉक के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था, अतः आम जनता के बीच इस बात का प्रचार नहीं हो सका कि इम्फाल-कोहिमा सीमा पर जापानी सैनिक नेताजी के नेतृत्व में युद्ध कर रहे हैं।
तीसरा कारण, भारतीय जवानों का मनोबल बनाये रखने के लिए ब्रिटिश सरकार ने नामी-गिरामी भारतीयों को सेना में कमीशन देना शुरु कर दिया था। इस क्रम में महान हिन्दी लेखक सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्सयायन अज्ञेयभी 1943 से 46 तक सेना में रहे और वे ब्रिटिश सेना की ओर से भारतीय जवानों का मनोबल बढ़ाने सीमा पर पहुँचे थे। (ऐसे और भी भारतीय रहे होंगे।)
चौथा कारण, भारत का प्रभावशाली राजनीतिक दल काँग्रेस पार्टी गाँधीजी की अहिंसाके रास्ते आजादी पाने का हिमायती था, उसने नेताजी के समर्थन में जनता को लेकर कोई आन्दोलन शुरु नहीं किया। (ब्रिटिश सेना में बगावत की तो खैर काँग्रेस पार्टी कल्पना ही नहीं कर सकती थी! ऐसी कल्पना नेताजी-जैसे तेजस्वी नायक के बस की बात है। ...जबकि दुनिया जानती थी कि इन भारतीय जवानोंकी राजभक्तिके बल पर ही अँग्रेज न केवल भारत पर, बल्कि आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं।) 
पाँचवे कारण के रुप में प्रसंगवश यह भी जान लिया जाय कि भारत के दूसरे प्रभावशाली राजनीतिक दल भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी ने ब्रिटिश सरकार का साथ देते हुए आजाद हिन्द फौज को जापान की कठपुतली सेना“ (पपेट आर्मी) घोषित कर रखा था। नेताजी के लिए भी अशोभनीय शब्द तथा कार्टून का इस्तेमाल वे अपनी पत्रिकाओं में करते थे।
***
खैर, जो आन्दोलन एवं बगावत 1944 में नहीं हुआ, वह डेढ़-दो साल बाद होता है और लन्दन में राजमुकुट यह महसूस करता है कि भारतीय सैनिकों की जिस राजभक्तिके बल पर वे आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं, उस राजभक्तिका क्षरण शुरू हो गया है... और अब भारत से अँग्रेजों के निकल आने में ही भलाई है।
वर्ना जिस प्रकार शाही भारतीय नौसेना के सैनिकों ने बन्दरगाहों पर खड़े जहाजों में आग लगाई है, उससे तो अँग्रेजों का भारत से सकुशल निकल पाना ही एक दिन असम्भव हो जायेगा... और भारत में रह रहे सारे अँग्रेज एक दिन मौत के घाट उतार दिये जायेंगे।
लन्दन में सत्ता-हस्तांतरणकी योजना बनती है। भारत को तीन भौगोलिक तथा दो धार्मिक हिस्सों में बाँटकर इसे सदा के लिए शारीरिक-मानसिक रूप से अपाहिज बनाने की कुटिल चाल चली जाती है। और भी बहुत-सी शर्तें अँग्रेज जाते-जाते भारतीयों पर लादना चाहते हैं। (ऐसी ही एक शर्त के अनुसार रेलवे का एक कर्मचारी अभी कुछ समय पहले तक तक वेतन ले रहा था, जबकि उसका पोता पेन्शन पाता था!) इनके लिए जरूरी है कि सामने वाले पक्ष को भावनात्मक रूप से कमजोर बनाया जाय। 
लेडी एडविना माउण्टबेटन के चरित्र तथा नेहरूजी से उनकी पुरानी घनिष्ठता (कॉलेज के दिनों की) को देखते हुए बर्मा के गवर्नर लॉर्ड माउण्टबेटन को भारत का अन्तिम वायसराय बनाने का निर्णय लिया जाता है- लॉर्ड वावेल के स्थान पर। एटली की यह चाल काम कर जाती है। विधुर नेहरूजी को लेडी एडविना अपने प्रेमपाश में बाँधने में सफल रहती हैं और लॉर्ड माउण्टबेटन के लिए उनसे शर्तें मनवाना आसान हो जाता है! 
***
बचपन से ही हमारे दिमाग में यह धारणा बैठा दी गयी है कि गाँधीजी की अहिंसात्मक नीतियों सेहमें आजादी मिली है। इस धारणा को पोंछकर दूसरी धारणा दिमाग में बैठाना कि नेताजी और आजाद हिन्द फौज की सैन्य गतिविधियों के कारणहमें आजादी मिली- जरा मुश्किल काम है। अतः नीचे खुद अँग्रेजों के ही नजरिये पर आधारित कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जिन्हें याद रखने पर शायद नयी धारणा को दिमाग में बैठाने में मदद मिले-
                सबसे पहले, इतिहासकार माईकल एडवर्ड के शब्दों में ब्रिटिश राज के अन्तिम दिनों का आकलनः
भारत सरकार ने आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चलाकर भारतीय सेना के मनोबल को मजबूत बनाने की आशा की थी। इसने उल्टे अशांति पैदा कर दी- जवानों के मन में कुछ-कुछ शर्मिन्दगी पैदा होने लगी कि उन्होंने ब्रिटिश का साथ दिया। अगर बोस और उनके आदमी सही थे- जैसाकि सारे देश ने माना कि वे सही थे भी- तो भारतीय सेना के भारतीय जरूर गलत थे। भारत सरकार को धीरे-धीरे यह दीखने लगा कि ब्रिटिश राज की रीढ़- भारतीय सेना- अब भरोसे के लायक नहीं रही। सुभाष बोस का भूत, हैमलेट के पिता की तरह, लालकिले (जहाँ आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चला) के कंगूरों पर चलने-फिरने लगा, और उनकी अचानक विराट बन गयी छवि ने उन बैठकों को बुरी तरह भयाक्रान्त कर दिया, जिनसे आजादी का रास्ता प्रशस्त होना था।
***
अब देखें कि ब्रिटिश संसद में जब विपक्षी सदस्य प्रश्न पूछते हैं कि ब्रिटेन भारत को क्यों छोड़ रहा है, तब प्रधानमंत्री एटली क्या जवाब देते हैं।
प्रधानमंत्री एटली का जवाब दो विन्दुओं में आता है कि आखिर क्यों ब्रिटेन भारत को छोड़ रहा हैः
1. भारतीय मर्सिनरी (पैसों के बदले काम करने वाली- पेशेवर) सेना ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति वफादार नहीं रही, और
2. इंग्लैण्ड इस स्थिति में नहीं है कि वह अपनी (खुद की) सेना को इतने बड़े पैमाने पर संगठित एवं सुसज्जित कर सके कि वह भारत पर नियंत्रण रख सके। 
***
यही लॉर्ड एटली 1956 में जब भारत यात्रा पर आते हैं, तब वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल निवास में दो दिनों के लिए ठहरते हैं। कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश चीफ जस्टिस पी.बी. चक्रवर्ती कार्यवाहक राज्यपाल हैं। वे लिखते हैं:
”... उनसे मेरी उन वास्तविक विन्दुओं पर लम्बी बातचीत होती है, जिनके चलते अँग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। मेरा उनसे सीधा प्रश्न था कि गाँधीजी का भारत छोड़ोआन्दोलन कुछ समय पहले ही दबा दिया गया था और 1947 में ऐसी कोई मजबूर करने वाली स्थिति पैदा नहीं हुई थी, जो अँग्रेजों को जल्दीबाजी में भारत छोड़ने को विवश करे, फिर उन्हें क्यों (भारत) छोड़ना पड़ा? उत्तर में एटली कई कारण गिनाते हैं, जिनमें प्रमुख है नेताजी की सैन्य गतिविधियों के परिणामस्वरुप भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों में आया ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में क्षरण। वार्तालाप के अन्त में मैंने एटली से पूछा कि अँग्रेजों के भारत छोड़ने के निर्णय के पीछे गाँधीजी का कहाँ तक प्रभाव रहा? यह प्रश्न सुनकर एटली के होंठ हिकारत भरी मुस्कान से संकुचित हो गये, जब वे धीरे से इन शब्दों को चबाते हुए बोले, ”न्यू-न-त-म!“      (श्री चक्रवर्ती ने इस बातचीत का जिक्र उस पत्र में किया है, जो उन्होंने आर.सी. मजूमदार की पुस्तक हिस्ट्री ऑव बेंगालके प्रकाशक को लिखा था।)
***
निष्कर्ष के रुप में यह कहा जा सकता है कि-
1. अँग्रेजों के भारत छोड़ने के हालाँकि कई कारण थे, मगर प्रमुख कारण यह था कि भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों के मन में ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में कमी आ गयी थी और- बिना राजभक्त भारतीय सैनिकों के- सिर्फ अँग्रेज सैनिकों के बल पर सारे भारत को नियंत्रित करना ब्रिटेन के लिए सम्भव नहीं था।
2. सैनिकों के मन में राजभक्ति में जो कमी आयी थी, उसके कारण थे- नेताजी का सैन्य अभियान, लालकिले में चला आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा और इन सैनिकों के प्रति भारतीय जनता की सहानुभूति।
3. अँग्रेजों के भारत छोड़कर जाने के पीछे गाँधीजी या काँग्रेस की अहिंसात्मक नीतियों का योगदान बहुत ही कम रहा।
*****
(टिप्पणीः प्रसंगवश यह भी जान लिया जाय कि भारत की आजादी (या सत्ता-हस्तांतरण) के लिए 15 अगस्त की तारीख को चुना जाना किसी सोच-विचार का परिणाम नहीं है। 3 जून 1947 को सभी भारतीय राजनेता भारत के बँटवारे के लिए राजी हो जाते हैं और इसके कुछ ही दिनों बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स में जब माउण्टबेटन से पूछा जाता है कि क्या उन्होंने कोई तारीख भी सोच रखी है इसके लिए, तो उनके मुँह से अचानक ही 15 अगस्त की तारीख निकल जाती है। दरअसल, इसी दिन करीब दो साल पहले जापान ने उनके सामने आत्मसमर्पण किया था, तो यह तारीख उनके लिए भाग्यशाली थी। वैसे, योजना जून’48 तक भारत को सत्ता-हस्तांतरित करने की थी। फरवरी’ 47 में इसी योजना को अंजाम देने के लिए माउण्टबेटन को अन्तिम वायसराय बनाकर भेजा गया था; मगर साथ ही, उन्हें कोई भी फैसला लेने की छूट भी दी गयी थी- एटली की तरफ से। भारत आकर माउण्टबेटन महसूस करते हैं कि अँग्रेज यहाँ ‘ज्वालामुखी के कगार’ पर, एक ‘फ्यूज्ड बम’ पर बैठे हैं, वे जितनी जल्दी यहाँ से निकल जायें, उतना अच्छा! ...तो एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स में अचानक ही सत्ता-हस्तांतरण की तारीख की घोषणा करते हुए वे एक तीर से दो निशाने साध लेते हैं- 1. अपने जीवन की भाग्यशाली तारीख को वे भारत का ‘स्वतंत्रता दिवस’ बना देते हैं; और 2. नेताजी के कारण भारत और जापान के बीच मैत्रीे कायम होने की जो सम्भावना थी, उसके रास्ते पर एक रोड़ा अटका देते हैं- 15 अगस्त को जब जापानी अपने जख्मों को सहला रहे होंगे, तब भारतीय ‘आजादी का जश्न’ मनाया करेंगे!)

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RAJ SINH said...

उसी नेवी की बगावत के सिपाहियों को गाँधी ने 'सिपाही नहीं गुण्डे' कहा था और अँग्रेजों ने उस विद्रोह को बेरहमी से कुचलने में कामयाबी पाई थी. जिस पर बगावती सिपाहियों को गोलियों से भून दिए जाने पर प्रसिद्ध इन्क्लाबी शायर 'साहिर लुधियानवी' ने लिखा था .........


ए रहबर मुल्को कौम बता, ये किसका लहू है कौन मरा
क्या कौमो वतन की जय गाकर मरते हुए राही गुण्डे थे
जो बागे गुलामी सह न सके वो मुजरिम-ए-शाही गुण्डे थे
जो देश का परचम ले के उठे वो शोख सिपाही गुण्डे थे
जम्हूर से अब नज़रें न चुरा अय रहबर मुल्को कौम बता
ये किसका लहू है कौन मरा .........

(रहबर= नेता, परचम= झण्डा, जम्हूर=जनता)

38 comments:

  1. मैं तो इस पर पहले से ही यकीन करता हूं कि गर्मदल, भगत सिंह और सुभाष के मार्ग ने ही आजादी दिलाने में योगदान किया. यद्यपि यह भी सही है कि महात्मा गांधी का योगदान भी कम नहीं था, देश को संगठित करने में महती भूमिका थी लेकिन बाद में...

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  2. जयदीप भाई
    जय हिंद !

    आज की आपकी यह पोस्ट बेहद अहेम है ...... आज आपने काफी सारे तथ्यों का खुलासा किया है ... हो सकता है काफी लोगो को इन बातों को समझने में दिक्कत हो .... इतने सालो की 'गुलामी' का कुछ तो असर होना ही है ! आपका बहुत बहुत आभार !

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  3. grt note.... worth reading 1000 times thnx for sharing:)

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  4. hello everyBODY m prasad chattaraj,bengal,want to say ,dat if any body is interested to work in practical field,to restore the status and respect of NETAJI ,THEN PLS CONTACT ME
    regards
    prasad chattaraj
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  5. internet ke karan hindustaniyo ko asli itihaas ki jankari mil rahi hai.. gandhi ke bhikh me ajadi pane ko to main sharmnak manta raha hu aajtak.. aur hamesha netaji ko hi asli neta mana..vastav me we hi asli yoddha aur bhartiya hero hain.. ye sharmnak hai ki ham ne unko unka samuchit samman shreya nahi diya..a b vaqt aa gaya hai. jai INA.. jai bose jai bharat

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  6. कुछ बाते जो मेरे मन है में भी बता दूँ.आज़ादी के अन्द्लोना में मुख्य क्रन्तिकारी भूमिका निभाने वाले हमारे अमर जवान शहीद भगत सिंह भी है अगर पुरे भारत में किसी गरीब या आजकल केक्सिस बने आमिर के घर में जाओगे तो कुछ फोटो अभी दीवार पर लटकाए दीखते है.नेताजी,शहीद,और आज़ाद,शिवाजी और राणा प्रताप मगर भारत का राष्ट्रपिता गाँधी को बता दिया है.कुछ जिनमे तो मध्ययुग के थे जबकि तिन आज़ादी के लड़ाई के समय के

    परन्तु बात पत्ते पे यहाँ अटकती है के भगत सिंह को फंसी दिलाने वाला कोण था ? तो अकेला गाँधी क्यों के आज़ादी की लड़ाई में ये भगत सिंह की साम्यवादी लड़ाई चाहते ही नहीं थे और बिरला बजाज टाटा और कही नामी अनामी घराने से निकलने वाली आवाजो ने ये सब नौजवानों को शहीद कर दिया ........अगर भगत सिंह और सुभाष बाबु जिन्दा होते तो २ विश्व युद्ध में भारत में आंतरविग्रह हो जाता तो इंग्लेंड में माल एक्सपोर्ट करने वाले ये स्थापित हितो का क्या होता और ये स्थापित हितो के चलते ही भगत सिंह को फंसी हो गई और उन के जरिये सुभाष की लड़ाई को नाकाम बना दिया इन को बस एक ही मतलब था के देश में हमको ही पूछे और हम ही देश के राष्ट्रपति प्रधानमंत्री राष्ट्रपिता बने रहे ..........

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  7. उसी नेवी की बगावत के सिपाहियों को गांधी ने ' सिपाही नहीं गुंडे ' कहा था और अंग्रेजों ने उस विद्रोह को बेरहमी से कुचलने में कामयाबी पाई थी. जिस पर बगावती सिपाहियों को गोलियों से भून दिए जाने पर प्रसिद्द इंकलाबी शायर ' साहिर ' लुधियानवी ने लिखा था .........

    ए रहबर मुल्को कौम बता ,ये किसका लहू है कौन मरा
    क्या कौमो वतन की जय गाकर मरते हुए राही गुंडे थे
    जो बागे गुलामी सह न सके वो मुजरिम-ए- शाही गुंडे थे
    जो देश का पर्चम ले के उठे वो शोख सिपाही गुंडे थे

    जम्हूर से अब नज़रें न चुरा अय रहबर मुल्को कौम बता
    ये किसका लहू है कौन मरा .........

    रहबर= नेता , परचम = झंडा ,जम्हूर =जनता

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  8. आदरणीय राज जी,
    बहुत बढ़िया.
    आपकी यह जानकारी बहुत लोगों की आँखें खोल देंगी.
    बहुत-बहुत धन्यवाद.
    अगर इस लेखमाला को पुस्तक के रूप में छापने के लिए वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर वाले तैयार हो गये (पाण्डुलिपि उनके पास है- उन्हें 'प्रामाणिकता' जाँचने के लिए अब तक कोई 'विशेषज्ञ' नहीं मिला है), तो आपकी उपर्युक्त जानकारी को भी मैं इस अध्याय में जोड़ने की कोशिश करूँगा. आशा है, आपकी सहमति रहेगी.
    ईति.

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  9. बहुत बढ़िया जानकारी दी गई है, मै खुद इस बात पर संदेह करता हूँ, की देश को आजादी दिलाने मै सिर्फ गाँधीजी का हाथ है. बल्कि मेरा मानना है की असल में आजादी हमें हमारे महान देश-भक्त शहीदों- भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु, अशफाकुल्ला खान, नेताजी और उनके जैसे हजारो-सैकड़ो भारत माता के वीर पुत्रो के बलिदानों से सच्चे प्रयासों से ही मिली है.

    जय हिंद, वन्देमातरम

    मनोज करगेती

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  10. nahi ye koi sahi tark nahi he are ab hmare paas kuch bca hi nahi tha isliye angrej des chod ke chale gaye

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  11. aajdi ki ladai me mukya rup se bhagat singh,
    aajad, vallabh bhai patel v sabhi garam dal ke netao ka yogdan hai.

    Ravi Raj

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  12. जय हिन्द सर जी! बहुत हि शान्द्दर -जान्दार काम कर रहे हैं.. शत-शत नमन! उम्मीद कम है कि पुस्तक प्रकिष्ट होगी -तथ्य को वेरीफाई करने वाले निष्पक्ष अ-राजनैतिक महापुरुष मिलना मुश्किल है. इंटरनेट के माध्यम से आपने जो ये किया है, उसके लिए मैं नि:शब्द हूँ!

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  13. main yeh kahna chahti hoon agar aazadi me 'neta ji' aur 'bhagat singh' aur unke saathion ka yogdaan hai toh 'gandi ji' ko sabhi kyon itna poojte hain????

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  14. भारत देश की अखंडता को प्रभावित करने वाला कोई और नहीं सिर्फ और सिर्फ गांधी था है और रहेगा चाहे वह 1947 के पहले का गांधी हो या 1947 के बाद का यह हम उत्तरोत्तर देखते चले आ रहे है फिर भी लोकजन को लगता है कि गांधी ही भारत को सुढ़ढ् करेगा ये सभी बाते मिश्रा जी जो आप ने लिखी वह मन में एक कुण्ठा पैदा करती है कि हम जानते तो है सब कुछ परन्तु सारे पात़्र इतने महिमा मण्डित है कि उनकी तरफ उंगली उठाना .........
    इस पूरे सवतन्त्रता पर्व को हम दो भाग में बांट सकते है पहला एसे स्वतन्त्रता सग्राम सेनानी जिन्होने सोते जागते केवल एक ही विश्वास कि फिरंगी को भगाना है बस दूसरा उन महिमा मण्डित कान्सपरेटर की जो उनका इस्तेमाल अपने स्वार्थ में किया करते थे जब चाहा जैसे चाहा उनके साथ खेल खेला और कुछ नहीं वैसा ही आजकल भी चल रहा है बस हम वर्तमान देख नहीं पा रहे है क्यों कि अतीत इतना कला है कि वर्तमान पर परछाई भी भारी पड् रही है

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  15. प्रिय राजेश जी,
    जय हिन्द.
    आपका कहना सही है. "वाग्देवी" प्रकाशन वालों को ऐसा कोई विशेषज्ञ नहीं मिला, जो इस लेखमाला की 'ऑथेंटिसिटी' चेक कर सके और उन्होंने पाण्डुलिपि लौटा दी.
    मगर कहते हैं कि एक रास्ता जब बन्द होता है, तो ऊपरवाला दूसरा खोल भी देता है... गाजियाबाद से श्री अरूण चन्द्र रॉय ने भरोसा दिलाया है कि वे इस लेखमाला को पुस्तक के रूप में अवश्य प्रकाशित करेंगे. ("ज्योतिपर्व" प्रकाशन नाम से वे एक प्रकाशन संस्थान की शुरूआत करने जा रहे हैं.) सम्भवतः नवम्बर तक बात बन जाय...
    ईति.

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  16. दीक्षा जी,
    जय हिन्द.
    मेरा मानना है कि स्वतंत्र भारत की नियति तय करने में गाँधीजी के कुछ फैसलों ने अहम् भूमिका निभायी है और इन फैसलों का कितना नफा या नुकसान हमारे देश को उठाना पड़ा है- इसका आकलन हम आज नहीं कर सकते; बल्कि आने वाली दो-एक शताब्दी के बाद क्षमाहीन और निर्मम "काल" इसका आकलन करेगा!
    (अध्याय 'गाँधी-नेहरू और सुभाष' में यह मैंने विचार रखा है.)
    ईति.

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  17. मेरे जिस किसी साथी ने इस अध्याय के 'लिंक' को हिन्दी "विकिपीडिया" में 'स्वतंत्रता दिवस' पन्ने पर 'बाहरी लिंक' के रूप में जोड़ने का कष्ट किया है, मैं उनके प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ. उनका बहुत-बहुत धन्यवाद.

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  18. मै नासिक से हू. नेताजी जिंदा थे इसके बहोत प्रमाण उपलब्ध है. नेताजी के एक अंगरक्षक थे जो नासिक से १० किमी. पर 'गंगापूर' नाम का एक छोटेसे गावं मे रहेते थे. सन ८४-८५ मे जब मै लगभग १२-१३ साल का था तब उन्होने एक स्थानीय वार्तापत्र मे बताया था की उन्हे अभी भी नेताजी के लेटर आते है. उन्होने इस बात का भी जिक्र किया था की आझादी के बाद भी नेताजी और वीर सावरकरजी एक दुसरे से मिलते थे. उन्होने स्वातंत्र संग्राम एव आझाद हिंद सेना के बारे मे तथा वीर सावरकरजी के बारे मे भी बहोत से तथ्य उजागर किये थे. तब मेरी उम्र इतनी नही थी की ये बाते मुझे समझ मे आये. बाद मे उनका देहांत होने कारण मिल नही सका. हो सके तो उनके बेटे, पोते से अगर कुछ जानकारी मिले तो देने की कोशिश जरूर करूंगा. आपने जो बाते एवं तथ्य सामने रखे है उसके लिये धन्यवाद.

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  19. हम सबको नेताजी के अंगरक्षक रहे आजाद हिन्द सैनिक के बेटे या पोते के संस्मरण का इन्तज़ार रहेगा...

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  20. N.K. SONI K.V. NO. 1, INDORENovember 2, 2011 at 8:08 PM

    yah lekh aaj ke har nojavan ko padhna jaruri hai jo ajadi ki kimat ko smajhe bina videshi companiyo ki nokari ko hi apne jeevan ka lakshya samajhta hai.

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  21. नेता जी के बारे में जान कर खुसी हुई,पर एक सवाल हें ? अगर नेता जी जिन्दा थे तो वो आजादी के बाद लोगो के सामने क्यों नही आये ?जबकि सारा देश उनकी इज्जत करता था सिर्फ कांग्रेस को छोड़ कर उम्मीद करता हु आप इसका जवाब जल्द देंगे

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  22. अभिषेक जी,
    जय हिन्द.
    इसी लेखमाला में एक अध्याय है- "4.7 नेताजी सोवियत संघ में ही थे!" यह दो भागों में है. पहले भाग में कुछ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का जिक्र है, तो दूसरे भाग में उन स्थितियों का जिक्र है- जो उनके भारत आने से समबन्धित हैं. यहाँ आपके प्रश्न का उत्तर मिल सकता है.
    ईति.

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  23. जयदीप जी, इसे पुस्तक के रूप में अवश्य प्रकाशित कीजिये.

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  24. i thing that in only before we blame of britis sarkar that everythin happened in india duo to of britis but we thing rong we do not think that brtis goev what will we give

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  25. बहुत बढ़िया जानकारी

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  26. हम सबको मिलाकर इस देश के इतिहास फिर से लिखना पड़ेगा और इस बात को देश के कोने कोने में तब तक चिल्लाकर कहना पड़ेगा जब तलक भारत का आने वाला भविष्य की अंतरात्मा खुद ही इस बात को न स्वीकार ले

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  27. जयदीप भाई
    एक प्रश्न है सुभाष बाबू ने गांधी जी को राष्ट्र पिता क्यों कहा ।
    मै समझता हूँ इसलिए कि गांधीजी की भूमिका भारत को पुनः एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने में अप्रितम थी । स्वयं सुभाष अपनी पुस्तक तरुणाई के सपने में स्वीकार करते है कि प्रत्येक राष्ट्र के जीवन में राष्ट्रीय भाव के क्षरण के अवसर आते हैं और जो राष्ट्र इससे बाहर निकल पाता है वही इतिहास में जीवित रहने में सक्षम होता है । गांधी का सबसे बड़ा योगदान भारत को इस क्षरण से बाहर निकालने में रही । जिससें राष्ट्रीय आन्दोलन साकार हो सका । यह कहना कि स्वतंत्रता सुभाष बाबू के कारण मिली वैसे ही है जैसे यह कहना कि वह गांधी के कारण ही मिली । मै समझता हूँ कि गांधी वादी अहिंसक धारा hsra की क्रान्तिकारी धारा और शचीन्द्र दा मोहन सिंह और अन्ततः सुभाष बाबू के वैदेशिक प्रयासों के सम्मिलित प्रभावो से आजादी मिली । किसी एक को पूर्ण श्रेय देना उचित नहीं है ।

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    1. गाँधीजी जानते थे कि हम गरीब भारतीयों के पास तोप-बन्दूक नहीं है, वे "अहिंसा" पर भी विश्वास करते थे, सो उन्होंने एक ऐसा रास्ता चुना देशवासियों को अँग्रेजों के खिलाफ लामबन्द करने का, जो हम भारतीयों के लिए सही था. गाँधीजी "साध्य" के साथ-साथ "साधन" की पवित्रता पर भी जोर देते थे. गाँधीजी एक ऐसे महापुरुष थे, जो "सिद्धान्त" व "व्यवहार" में अन्तर नहीं रखते थे- ऐसा बन पाना बहुत-बहुत मुश्किल होता है. सारा देश गाँधीजी के पीछे खड़ा था. सुभाष बाबू ने जब काँग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया, तब यही कहा कि जब देश के सबसे महान व्यक्ति का ही समर्थन उन्हें हासिल नहीं है, तो फिर इस पद पर रहकर वे क्या करेंगे.
      इन सबके बावजूद, मुझे लगता है कि गाँधीजी को यह अहसास हो गया था कि "वे महान हैं" या "वे एक महापुरुष हैं", या "उनके बाद दुनिया में गाँधीवाद नाम का एक फलसफा कायम रहेगा" (अन्तिम बात एकबार उनके मुंह से निकल भी गया था). किसी भी महान व्यक्ति को अपनी महानता का अहसास होना- मेरे हिसाब से अच्छा नहीं होता है. इससे एक तरह का अहं भाव पैदा होता है.
      खैर, इसी ब्लॉग में एक पोस्ट है- गाँधी-नेहरू और सुभाष, उससे मैं कुछ पंक्तियों को यहाँ उद्धृत करता हूँ:
      "आजादी या स्वराज के अन्तिम लक्ष्य, यानि "साध्य" को पाने के लिए नेताजी किसी भी "साधन" को अपनाने के तैयार थे। उनके अनुसार, देश की आजादी के लिए अगर शैतान से भी हाथ मिलाना पड़े, तो वे मिलायेंगे। (सन्दर्भ: हिटलर-मुसोलिनी से मैत्री।) इसके मुकाबले गाँधीजी "साधन" की पवित्रता पर जोर देते थे। उनका स्पष्ट कहना था: "मैं अपने देश या अपने धर्म तक के उद्धार के लिए सत्य और अहिंसा की बलि नहीं दूँगा। वैसे, इनकी बलि देकर देश या धर्म का उद्धार किया भी नहीं जा सकता।""
      व्यक्तिगत रुप से मैं अगर एक धार्मिक स्वभाव का व्यक्ति होता, तो बेशक मैं गाँधीजी की बात को सही ठहराता; मगर क्या करुँ, मेरे गुणसूत्र की बनावट के हिसाब से मैं आध्यात्मिक होने के साथ-साथ एक "देशभक्त" भी हूँ, और मैं सुभाष बाबू की बातों के साथ हूँ. इस लिहाज से, 1922 में गाँधीजी को असहयोग आन्दोलन वापस नहीं लेना चाहिए था और 1944 में नेताजी के सैन्य अभियान का समर्थन करना चाहिए था.
      जो उद्धरण मैंने ऊपर प्रस्तुत किया, उसी का अगला पारा:
      "इस 'वैचारिक मतभेद' के बावजूद नेताजी गाँधीजी के प्रति 'पिता'-जैसा सम्मान मन में बनाये रखते हैं। वे गाँधीजी को “राष्ट्रपिता” कहकर सम्बोधित करते हैं- आजाद हिन्द रेडियो पर। नेताजी यह भी कहते हैं कि एकबार देश आजाद हो जाय, फिर अहिंसा की नीति पर हम चलेंगे। मगर गाँधीजी इस 'वैचारिक मतभेद' के चलते नेताजी के प्रति पुत्र वाला स्नेह दिखाने से शायद चूक गये- कम-से-कम "वक्त पर" तो चूक ही गये! (1944 के इम्फाल युद्ध के समय नेताजी बहुत ही नाजुक स्थिति में थे- मगर किसी भारतीय नेता ने उनका समर्थन नहीं किया...)"

      ***
      खैर, मैंने इस अध्याय की शुरुआत जिन पंक्तियों से की है, शायद आप उसका मर्म नहीं समझ पाये हों. एकबार फिर से पढ़कर देखियेगा. 1946 में जब अँग्रेज भारत छोड़ने का निर्णय लेते हैं (1857 में नहीं लिया, 1922 में नहीं लिया, 1942 में नहीं लिया), तब कोई आन्दोलन नहीं चल रहा था. अँग्रेज बर्मा और सिंगापुर तक को फिर से जीत चुके थे... फिर यह निर्णय क्यों? कृपया फिर से इस विषय पर विचार कीजिये...
      इति.

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  28. सारगर्भित और तर्कसंगत उत्तर के लिए धन्यवाद जयदीप भइया ।
    आपका अध्ययन विशाल है और मेधा प्रखर । पर इस चर्चा को आगे विनम्रतापूर्वक बढाना चाहता हू यदि आप स्वीकृति दें उद्देश्य केवल भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के सन्दर्भ में अपने कुछ प्रश्नों का निवारण है । सभार ।

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    1. सर, मैं शर्मिन्दा हूँ कि मैंने कुछ कड़वी बातें उत्तर में लिख दीं. मुझे नादान समझ कर क्षमा करेंगे. मेरे कहने का तात्पर्य यह था कि गरीब, अशिक्षित भारतीयों को अँग्रेजों के खिलाफ "लामबन्द" करने में गाँधीजी का पूरा योगदान रहा; मगर 1946 में जो अँग्रेजों ने भारत को छोड़ने का निर्णय लिया, उसमें गाँधीजी का योगदान बहुत कम था- जिसे कि तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने भी स्वीकार किया. मुख्य कारण यही था कि भारतीय थलसेना की विश्वप्रसिद्ध "राजभक्ति" दरक गयी थी और इस दरक के पीछे "अप्रत्यक्ष" रुप से नेताजी सुभाष ही कारण थे. मुझे उम्मीद है कि एक-डेढ़ शताब्दी बाद जब क्षमाहीन और निर्मम "काल" इसका आकलन करेगा, तब सच्चाई सामने आ जायेगी. तब तक के लिए हमलोग विशेष कुछ नहीं कर सकते. वैसे भी, एक राष्ट्र के इतिहास में एक-दो या तीन सदी कोई बहुत बड़ा कालखण्ड नहीं होता.

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    2. जयदीप भाई
      आपको शर्मिंदा होने की कोई आवश्यकता नहीं है । सच कहूं तो मुझे आपके उत्तर में कुछ कटु लगा भी नहीं । वस्तुतः मैने आपकी लगभग पोस्टे पढ़ी और आपकी शोधपूर्ण प्रवृत्ति से प्रभावित हुआ । क्यों कि आपके लेखन में मुझे एक आपेक्षित संतुलन दिखाई पड़ा अत: आपसे चर्चा कर अपनी कुछ शंकाओं का समाधान करना चाहा । क्योंकि इंटरनेट लेखन पाठक को यह सुविधा देता है कि पाठक त्वरित टिप्पणी के द्वारा अपनी प्रतिक्रिया दे सकता है जो अन्य माध्यमों में संभव नहीं है अत: लेखक और पाठक दोनों को इसका लाभ लेना चाहिए , ऐसा सोच कर प्रतिक्रिया दी । मैने कई ऐसे ब्लॉग देखें हैं जहां मूल पाठ से अधिक रोचक और ज्ञानवर्धक प्रतिक्रियाएं हो गई हैं , किन्तु ऐसा होना लेखक और पाठक दोनों की सजगता से ही सम्भव है । आपकी विचारप्रक्रिया से मुझे प्रतीत हुआ कि आप इस हेतु एक पात्र पुरुष हैं इसलिये ये दुस्साहस कर गया , आशा है कि आप क्षमा कर देंगे । लेखक और पाठक दोनों की सजगता से ही सम्भव है । आपकी विचारप्रक्रिया से मुझे प्रतीत हुआ कि आप इस हेतु एक पात्र पुरुष हैं इसलिये ये दुस्साहस कर गया , आशा है कि आप क्षमा कर देंगे

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    3. अस्तु , यहाँ कुछ अतिरिक्त जानकारियाँ साझा करना चाहूंगा ,हो सकता है कि इनमें से बहुत से आप पूर्वपरिचित हों । ढाका में अनुशीलन समिति और महाराष्ट्र में मित्र मेला की स्थापना के कुछ समय बाद से ही विदेशी भूमि पर भी क्रान्ति प्रयास प्रारंभ हो गए थे । कोमागातामारू प्रकरण , गदर आन्दोलन , रेशमी रुमाल आदि को इसी सन्दर्भ में देखना चाहिए । प्रथम महायुद्ध के समय भी जर्मनी की सहायता से भारतीय सेना में विद्रोह के प्रयास किए गए इसे जर्मन प्लान के नाम से जाना गया ,दुर्भाग्य से यह असफल रहा । इस सन्दर्भ में सावरकर (लन्दन हाउस ) ,लाला हरदयाल(कनाडा), श्याम जीकृष्ण वर्मा ,महेन्द्र प्रताप (स्विट्जरलैंड), डा. मथुरा सिंह (फारस ,मेसोपोटामिया), नरेन्द्र नाथ(बटेविया), भोलानाथ चटोपाध्याय (बैंकाक) ,चम्पकरामन, रामचंद्र, वीरेन चटोपाध्याय, बरकतउल्ला ,हेरम्बलाल गुप्त आदि हुतात्माओं के नाम उल्लेखनीय हैं ।वस्तुतः क्रान्तिकारी आन्दोलन कुछ ही समय में दो श्रेणियों-त्रासवादी और विप्लववादी में विभाजित था । त्रासवादी जैसे HSRA आदि भारत में रहकर कार्य रत थे जबकि विप्लववादी विदेशी भूमि में रहकर भारतीय सेना में द्रोह का प्रयास कर रहे थे ।
      १९१५ में इस सन्दर्भ में ऐतिहासिक मोड़ रासबिहारी बोस के जापान जाने के बाद आया ।लार्ड हार्डिंग पर बम प्रहार के बाद वे गुरुदेव टैगोर के सहयोगी के छद्मवेश में जापान चले गए पर बाद में अंग्रेजी सरकार के दबाव से जापान उन्हें सौंपने को राजी हो गया तो वे भूमिगत हो गए और भारत से भी लम्बे समय तक भूमिगत रहे बाद में जापानी नागरिकता पा कर द्वितीय विश्वयुद्ध के समय सार्वजनिक हुए और INA की स्थापना की जब सुभाष बाबू जापान आए तो बागडोर उन्हें सौंप दी गई । इस तरह INA की स्थापना की एक व्यापक पूर्वपीठिका थी यह अनेकों भारतीय क्रान्तिदर्शियों की क्रान्तिकला का परिणाम थी । परमेश्वर ने सुभाष बाबू को यह सौभाग्य प्रदान किया कि वे इस कार्य का नेतृत्व करें ।यह भी ध्यान योग्य है कि नेताजी सुभाषचंद्र को जर्मनी और इटली में सफलता नहीं मिली क्रान्ति की देवी जापान में बैठ कर लम्बे समय से उनकी प्रतीक्षा कर रही थी ।

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  29. आपने एक प्रश्न यह भी उठाया है कि भारत को स्वतंत्रता १९४६ के बाद ही क्यों मिली । निश्चित ही लालकिले के मुकद्दमे और शाही नौसेना विद्रोह ने इसमें महती भूमिका निभाई और सुभाष बोस का संघर्ष भी महत्वपूर्ण था । यह वह समय था जब नकेवल सेना बल्कि नौकरशाही यहाँ तक कि न्यायालय की राजभक्ति भी संदिग्ध थी । परन्तु निम्न तथ्यों पर विचार करना भी आवश्यक है -

    १९४०-४५ के दौर में चर्चिल जैसा रूढ़िवादी और भारत के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित प्रधानमन्त्री था जो समस्त तथ्यों के बावज़ूद भारतीय स्वतन्त्रता के सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ था ।उसके जाते ही घटनाचक्र में एक महान परिवर्तन दिखाई देता है ।

    १९४५में प्रख्यात अर्थशास्त्री कीन्स ब्रिटिश वारकैबिनेट के समक्ष युद्धोत्तर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर आधारित एक दस्तावेज प्रस्तुत करता है जिसमें बताया गया कि फिलवक्त ब्रिटेन पर ३०० करोड पौंड के विशाल आंकड़े पर पहुंच गया है । आगे अमेरिकी सहायता भी तभी मिल सकती है जब हम अपने व्यय में कटौती करें ।

    कीन्स का आकलन था कि इस विशाल राशि में २०० करोड़ अफ्रीका , मध्य एशिया और भारत में साम्राज्यवादी प्रशासन का खर्च है और हमारी वित्तीय परेशानियों के लिए मुख्यतः यही खर्च जिम्मेदार है ।

    भारत -ब्रिटेन व्यापार अब फायदे का सौदा नहीं था । भारत के साथ इंग्लैण्ड का अतिरिक्त व्यापार जो१९२४ में ७.५ करोड़ पौंड था १९३७ में घटकर२.५ करोड़ पौंड पर आ गया था । इतिहासकार बरनेट के शब्दों में - " यह किसी जगह अकारण विधमान रहने की इतिहास की सबसे उम्दा मिसाल थी । "

    १९४५ में बेवल ने एक गुप्त ज्ञापन लंदन भेजा जिसमें भारत में पुनः एक बड़े आन्दोलन की शंका थी । इससे निबटने के लिये उसने सेना की अतिरिक्त टुकडियां मांगी पर वार आफिस ने इसे दे पाने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी ।

    कमांडर इन चीफ आंचिंलेक ने दिसम्बर४५ की अपनी रिपोर्ट में लिखा कि १९४२ के आन्दोलन से कांग्रेस ने यह सीख लिया है कि सड़क रेल और संचार व्यवस्था को कितनी आसानी से ठप्प किया जा सकता है । देश में बड़े पैमाने पर अवैध हथियार मौजूद हैं और इनके परिचालन में मदद के लिए आई एन ए के भूतपूर्व सैनिक भी मौजूद हैं ।

    १९४४ में बेबल ने चर्चिल को एक में लिखा कि ब्रिटेन के पास अब वह अधिकार नहीं है कि वह कोई ठोस कार्यवाही कर सके ।

    इस तरह भारत की स्वतन्त्रता किसी तात्कालिक घटना का तात्कालिक परिणाम नहीं थी । इसका वास्तविक कारण यह था कि भारतीय जनता ने ब्रिटेन के राजनैतिक आभार का परित्याग कर दिया था तथा यह स्थिति एक लम्बे सतत बहुआयामी और बहुकोणीय संघर्ष के फलस्वरूप प्राप्त हुई थी । १९४५-४६ की घटनाएँ किसी निर्वात में नहीं घटित हुई थी , विश्व इतिहास गवाह है कि सेनाओं ने क्रान्ति के कार्य जनसमर्थन के बाद ही किए हैं (मैं तख्ता पलट की बात नहीं कर रहा ) तो सेना का विद्रोह भी जनता की मन: स्थिति का प्रतिबिम्ब मात्र ही था ।

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    1. आदरणीय उत्कर्ष जी,
      आशा करता हूँ, अब से जो भी विचारवान पाठक इस ब्लॉग (पोस्ट ) पर आयेंगे, उन्हें बहुत-सी नयी जानकारियाँ मिलेंगी, जो आपने ऊपर टिप्प्णी या चर्चा के रुप में साझा की है.
      मेरी जानकारी बहुत ही सीमित है. सच तो यह है इस लेखमाला को जब मैंने शुरु किया था, तब मेरे जेहन में पाठकवर्ग के रुप में किशोरों एवं युवाओं की छवि थी. बाद में यह थोड़ा गम्भीर जरुर हुआ, मगर देखा जाय, तो अब भी यह नयी पीढ़ी को नेताजी से परिचित कराने का एक सरल प्रयास भर है- खासकर, 1941 से 45 के घटनाक्रमों से, जिनके बारे में हमारी पाठ्य-पुस्तकों में जानकारियाँ नहीं (के बराबर) मिलती हैं.
      मैं कृतज्ञ हूँ कि आप यहाँ आये और हमें आपने बहुत-सी जानकारियाँ दीं.
      पुनः हार्दिक आभार.

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  30. धन्यवाद जयदीप भाई,
    आपकी सदयशता आपके व्यक्तित्व की विशालता का प्रमाण है ।
    वो चाहे गांधी हो या सुभाष या फिर कोई और , इतिहास के प्रवाह में सबकी अपनी-अपनी भूमिकाएं थी और यदि वे समरूप होते तो महान बन भी नहीं सकते थे । उनके कार्यो को समग्रता में देखने पर ही सम्पूर्ण चित्र प्राप्त होता है । एक हिन्दू होने के नाते मेरा विश्वास है कि बिना प्रारब्ध के कोई गांधी या सुभाष बन ही नहीं सकता । महान आत्माएं एक दूसरे की भूमिकाओं को पूर्णता प्रदान करती है । राष्ट्रों की भूमिकाओं को निर्धारित करना अकेले व्यक्तित्वों के बस की बातहोती भी नहीं, यह अलग बात है कि इतिहासकार उनकी भूमिकाएं कैसे विश्लेषित करते हैं और हम उन्हें कैसे ग्रहण करते हैं ।
    एक बार पुनः ह्दय के अन्तरतम से धन्यवाद ।

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