Blog Header Naaz-E-Hind

Blog Header Naaz-E-Hind

Monday, October 25, 2010

5.1 आखिर क्या हुआ होगा नेताजी का?

Anonymous said...

Mind boggling. ...



स्तालिन के समय में सोवियत संघ में नेताजी के जिक्रपर प्रतिबन्ध था। वैसे भी, उन दिनों के सोवियत संघ के लोहे के पर्दों’ (Iron Curtains) के बारे में भला कौन नहीं जानता!
हमने अब तक यह जान लिया है कि नेताजी 23 अगस्त 1945 से सोवियत संघ में थे और कुछ वर्षों तक याकुतस्क में रहे। इसके बाद क्या हुआ, यह वाकई एक रहस्य है।
आईये, एक-एक कर उन सभी विकल्पों/सम्भावनाओं पर यहाँ विचार करें कि आखिर नेताजी का क्या हुआ होगा!
सबसे पहले दो मुख्य सम्भावनाः
1. नेताजी सोवियत संघ से भारत नहीं लौटे, और
2. नेताजी सोवियत संघ से भारत लौट आये।

पहली सम्भावना पर विस्तृत चर्चा
अगर नेताजी भारत नहीं लौटे, तो उनके साथ क्या हुआ?

1.क) क्या स्तालिन ने नेताजी की हत्या करवा दी?
1948 तक स्तालिन कोशिश करते हैं कि नेताजी ससम्मान भारत लौट जायें, मगर भारत सरकार नेताजी को स्वीकार करने से मना कर देती है। इस पर हो सकता है कि कुछ समय बाद स्तालिन ने नेताजी की हत्या करवा दी हो। स्तालिन ने बहुतों की हत्या करवायी है। उनके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है। उन्हें जानने वाले उन्हें हिटलर से भी ज्यादा निर्दय और निष्ठुर बताते हैं।

1.ख) क्या नेताजी को ब्रिटेन को सौंप दिया गया?
इस विकल्प पर विचार करने के लिए हमें जरा पीछे चलना होगा। जर्मनी 1942 में लाल सेना के जेनरल वाल्शोव को युद्धबन्दी बनाता है। बाद में ये वाल्शोव जर्मनी में करीब दो लाख सैनिकों की एक सेना गठित करते हैं और लाल सेना के ही सैनिकों से सोवियत संघ में स्तालिन का तख्ता पलटने का आह्वान करते हैं। विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय के बाद ये वाल्शोव ब्रिटिश सेना के हाथ लगते हैं। 1948 में वाल्शोव को उनके आदमियों सहित सोवियत संघ प्रत्यर्पित कर दिया जाता है और स्तालिन वाल्शोव तथा उनके ज्यादातर लोगों को मौत के घाट उतार देते हैं। क्या अपने दुश्मन वाल्शोव को पाने के लिए स्तालिन ने ब्रिटेन के साथ नेताजी का सौदा कर लिया?

1.ग) क्या बलूचिस्तान-ईरान सीमा पर नेताजी की हत्या की गयी?
पिछले विकल्प की अगली कड़ी। लॉर्ड माउण्टबेटन और वावेल नेताजी को मौके पर मार देनेके हिमायती हैं- बिना मुकदमा चलाये, बिना किसी प्रचार के। अतः अगर ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों ने स्तालिन से नेताजी को (वाल्शोव के बदले) हासिल कर लिया, तो क्या उन अधिकारियों ने चुपचाप नेताजी की हत्या कर दी? ऐसी खबरें हैं कि कुछ लोगों ने 1948 में क्वेटा में नेताजी को देखा था- ब्रिटिश सैन्य अधिकारी उन्हें बन्दी बनाकर कार में बलूचिस्तान-ईरान सीमा के नो-मेन्स लैण्डकी ओर ले जा रहे थे।

1.घ) क्या नेताजी साइबेरिया जेल में परिपक्व उम्र में मृत्यु को प्राप्त हुए?
ऐसा भी हो सकता है कि नेताजी ने परिपक्व उम्र में साइबेरिया के याकुत्स्क शहर की जेल की एक कोठरी में अपनी अन्तिम साँस ली हो। (नेताजी का जन्म 1897 में हुआ था- परिपक्व उम्र का अनुमान आप लगा सकते हैं।)
***
एक तथ्य है, जिसे उपर्युक्त विकल्पों के खिलाफ खड़ा किया जा सकता है। इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता। यह तथ्य है- नेताजी ने खाली हाथसोवियत संघ में प्रवेश नहीं किया था, बल्कि उनके साथ बड़ी मात्रा में सोने की छड़ें और सोने के आभूषणथे। (नेहरूजी को सन्देश भेजने वाले सूत्र के कथन को याद कीजिये- ‘...उनके साथ बड़ी मात्रा में सोने की छड़ें और गहने थे...।) जिक्र करना प्रासंगिक होगा कि आजाद हिन्द बैंकका सोना अब तक अप्राप्यहै। अतः अनुमान लगाया जा सकता है कि उस खजाने का एक हिस्सा नेताजी के साथ ही सोवियत संघ तक गया होगा।
इस सोने या खजाने के बदले में- अनुमान लगाया जा सकता है कि- सोवियत संघ में न तो नेताजी हत्या हुई होगी; न उन्हें ब्रिटेन के हाथों सौंपा गया होगा, और न ही उन्होंने अपना सारा जीवन साइबेरिया की जेल में बिताया होगा।
उन्होंने भारत आना चाहा होगा और रूसियों को इसपर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

दूसरी सम्भावना पर विस्तृत चर्चा
दूसरी सम्भावना यह है कि नेताजी भारत लौट आये। मगर कब? क्या स्तालिन की ही अवधि में? इसकी सम्भावना कम नजर आती है। उन दिनों भारत और सोवियत संघ के बीच या नेहरूजी और स्तालिन के बीच सम्बन्ध इतने घनिष्ठ तो नहीं ही थे- कि नेताजी और नेहरूजी के बीच किसी समझौते की गुंजाइश बने। (नेहरूजी के प्रधानमंत्री बनने पर स्तालिन कोई प्रसन्नता जाहिर नहीं करते हैं; न ही वे (राजदूत) विजयलक्ष्मी पण्डित को मिलने का समय देते हैं। यहाँ तक कि वे भारत को स्वतंत्रराष्ट्र भी नहीं मानते- राष्ट्रमण्डलकी सदस्यता के कारण!)
मार्च 1953 में स्तालिन की मृत्यु होती है और उनके द्वारा साइबेरिया की जेलों में बन्दी बनाये गये लोगों के पुनर्वासका कार्यक्रम 1955 में शुरु होता है। जाहिर है, ‘नेताजीके भी पुनर्वासका प्रश्न तब उठा होगा। पुनर्वासके लिए नेताजी ने भारत आना चाहा होगा। उधर नेहरूजी अराजकताफैलने के खतरों के कारण नहीं चाहते कि नेताजी भारत आयें। ऐसे में, सोवियत राष्ट्रपति निकिता ख्रुश्चेव ने मध्यस्थता की होगी। फैसला यही हुआ होगा कि नेताजी भारत में ही अपना जीवन गुजारेंगे, मगर अप्रकटरहकर, जिससे कि देश में किसी प्रकार की राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति पैदा न हो।
अराजकताया राजनीतिक अस्थिरताके अलावे कुछ अन्य बातों पर भी ध्यान देने की जरूरत हैः
अगर नेताजी प्रकटहो जाते हैं, तो-
1. कर्नल हबिबुर्रहमान सहित उनके दर्जनों सहयोगी और जापान देश दुनिया के सामने झूठा साबित हो जाता है।
2. उन्हें ब्रिटिश-अमेरीकी हाथों/आँखों से बचाने के लिए किये गये सारे प्रयासों पर पानी फिर जाता है।
3. 21 अक्तूबर 1943 के दिन उन्होंने शपथ ली थी- ”...मैं सुभाष चन्द्र बोस, अपने जीवन की आखिरी साँस तक आजादी की इस पवित्र लड़ाई को जारी रखूँगा... ।“ ...मगर वे ऐसा नहीं कर पाते और उन्हें लगता होगा कि अब अपने देशवासियों के बीच शान से जीने का उन्हें हक नहीं है। 
खैर, ‘अप्रकटरहने के कारण चाहे जितने भी हों, मगर इतना है कि 1941 का जियाउद्दीन“..., 1941-42 का काउण्ट ऑरलैण्डो माजोत्ता“..., 1943 का मस्तुदा“..., 1945 का खिल्सायी मलंग“... अन्तिम बार के लिए एक और छद्म नाम और रूप धारण करता है... और सोवियत संघ से भारत में प्रवेश करता है...
...भारत माँ के सबसे बहादूर सपूतों में से एक- सुभाष- आधी दुनिया का चक्कर लगाकर..., दीर्घ चौदह वर्षों का वनवास और अज्ञातवास काटकर... माँ की गोद में लौटता है...
...कोई माने या न माने, मगर नेताजी अपनी मातृभूमि की आँचल में अपना शेष जीवन बिताने जरूर लौटे होंगे...
अब लाख टके का सवाल यह है कि इस अन्तिम बार के लिए नेताजी कौन-सा नाम और रूप धारण करते हैं?
इस सम्बन्ध में कई तरह की अवधारणायें प्रचलित हैं, मगर यहाँ दो प्रमुख अवधारणाओं पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।

2.क) क्या नेताजी ने स्वामी शारदानन्दका रूप धारण किया था?
प्रचलित कहानी के अनुसार, 29 सितम्बर 1961 को एक शिक्षक श्री राधेश्याम जायसवाल पत्र लिखकर नेहरूजी को सूचित करते हैं कि सिलहट के पास शौलमारी आश्रम के साधू की गतिविधियाँ सन्देहास्पद हैं। वे चैन-स्मोकर हैं- आयातित सिगरेट पीते हैं; रूसी, चीनी, जर्मन इत्यादि भाषाओं के जानकार हैं; और उनके आश्रम के आस-पास ऐसी अफवाह है कि वे नेताजी हैं। श्री जायसवाल को सन्देह था कि आश्रम में कोई विदेशी षड्यंत्र चल रहा है।
(चैन-स्मोकर- लगातार सिगरेट पीने वाले। नेताजी भी आयातित सिगरेट का शौक रखते थे, यह उनके एक छायाचित्र से पता चलता है।)
आश्रम के साधू हैं- स्वामी शारदानन्द। बता दिया जाय कि नेताजी के लालन-पालन में माँ के अलावे जिन महिला का हाथ रहा है, उनका नाम शारदाथा। साल-डेढ़ साल पहले कूच बिहार जिले (पश्चिम बंगाल) के फालाकाटा के पास शौलमारी में उन्होंने आश्रम की स्थापना की है।
गुप्तचर विभाग वाले आश्रम की गतिविधियों की जाँच करते हैं और अपनी रिपोर्ट में कहते हैं कि वहाँ कुछ गलत नहीं है।
दिल्ली के वीर अर्जुनदैनिक में खबर छपती है। नेताजी के भक्त और आजाद हिन्द फौज वाले आश्रम पहुँचने लगते हैं। फौजी जब आश्रम से बाहर आते हैं, तब उनके होंठ सिले होते हैं। सिर्फ एक मेजर सत्यप्रकाश गुप्ता कोलकाता में (फरवरी’ 62 में) प्रेस कॉन्फ्रेन्स कर घोषणा करते हैं कि शारदानन्द नेताजी हैं।
इस बीच श्री उत्तम चन्द मल्होत्रा भी 30-31 जुलाई 1962 को शारदानन्द से मिलते हैं और मिलने के बाद दावा करते हैं कि उन्होंने पहचान लिया है- आश्रम के सन्यासी शारदानन्दऔर कोई नहीं, बल्कि नेताजी हैं!
उत्तम चन्द मल्होत्रा वे व्यक्ति हैं, जिनके साथ एक ही कमरे में नेताजी ने 46 दिन बिताये थे- काबुल में, जब वे (नेताजी) जियाउद्दीनका भेष धारण कर यूरोप जाने का प्रयास कर रहे थे और दूसरी तरफ ब्रिटिश जासूस उनकी जान के पीछे पड़े थे।
                इन दो व्यक्तियों द्वारा रहस्योद्घाटन के बाद स्वामी शारदानन्द आठ महीनों के लिए अज्ञातहो जाते हैं। इसके बाद भी लगभग आठ वर्षों तक वे देशाटन पर ही रहते हैं और प्रकाश में नहीं आते।
अज्ञातवास के समय वे सतपुड़ा के जंगलों में मेलघाट (महाराष्ट्र) में रहते हैं।
                1972 में सरकार उन्हें देहरादून और मसूरी के बीच राजपुरा में एक कोठी (नं-194) और कुछ जमीन मुहैया कराती है। उनकी उम्र 76 वर्ष हो चली है, भटकने की उम्र अब नहीं रही। अब शायद वे ज्यादा जीयेंगे भी नहीं।
उन्हें कोठी श्रीमती नयनतारा सहगल की कोठी के पास दिया जाता है। नयनतारा सहगल बेटी हैं श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित की। स्वामी जी को कोठी दिलाने में जरूर उन्होंने ही मदद की है। आप सोचेंगे क्यों? क्योंकि नेताजी की बेटी अनिता बोस जब 18 वर्ष की उम्र में पहली बार भारत आयी थी (1960 में), तब दिल्ली में 5 दिनों के लिए श्रीमती नयनतारा सहगल ने ही उन्हें अपने घर में रखा था। अर्थात् नेताजी के साथ उनका एक तरह से पारिवारिक रिश्ता पहले से ही है।
यहाँ स्वामी जी शान्ति से अपना जीवन गुजारते हैं। लोगों से उनकी बात-चीत नहीं के बराबर है। उनके पास कोई सामान नहीं है। फर्नीचर के नाम पर सिर्फ एक कुर्सी है। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष- किसी भी रूप से- वे यह आभास दिलाने की कोशिश नहीं करते कि वे नेताजी हैं। 
कहा जाता है कि स्वामी शारदानन्द ने 110 दिनों की समाधि ली थी। 93वें दिन उनके गर्दन के पीछे रक्त की एक बूँद शरीर से बाहर आती है और इस प्रकार, 13 अप्रैल 1977 को वे देह त्यागते हैं।
उत्तर प्रदेश पुलिस एवं प्रशासन के संरक्षण में स्वामी शारदानन्द जी का अन्तिम संस्कार ऋषिकेष में गंगा किनारे त्रिवेणी घाट पर होता है।
***
श्री अजमेर सिंह रन्धावा, जो कि इस अन्तिम संस्कार के एक प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं, का कहना है कि स्वामी शारदानन्द के पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेट कर पाँच दिनों तक जनता के दर्शनार्थ रखा गया था और उनका अन्तिम संस्कार- बन्दूकों की सलामी सहित- पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ हुआ था।
उनके अनुसार, बहुत-से गणमान्य लोगों के अलावे श्री उत्तम चन्द मल्होत्रा तथा नेताजी की एक भतीजी (सम्भवतः श्रीमती अनिमा बोस) अपने बेटे के साथ यहाँ आयीं थीं- अन्तिम दर्शनों के लिए।
श्री रन्धावा एक रोचक बात की जानकारी देते हैं। जब कभी श्री रन्धावा की टैक्सी स्वामी जी के लिए मँगवायी जाती थी, एक नौकर पहले एक बाल्टी पानी लाकर टैक्सी के अन्दर-बाहर पोंछा लगाता था, तब जाकर स्वामी जी टैक्सी में बैठते थे। बाल्टी के पानी में कुछ कटे हुए नीम्बू तैरते रहते थे। तब श्री रन्धावा स्वामी जी को एक सामान्य सन्यासी तथा इस नीम्बू-पानीको एक टोटका समझते थे। स्वामी जी के देह त्यागने के बाद जब उनके नेताजीहोने की भनक उन्हें मिली, तब जाकर उन्हें नीम्बू-पानीका रहस्य समझ में आया- नीम्बू का अम्ल (एसिटिक एसिड) उँगलियों की छाप (फिंगरप्रिण्ट) लेने वाले पाउडर को नाकाम कर देता है!
*** 
डॉ. सुरेश पाध्ये, जो पिछले प्रायः दस वर्षों से स्वामीजी के सान्निध्य में थे, का कहना है कि उन्होंने छायाकार श्री एस. जोगी के माध्यम से अन्तिम संस्कार के फोटो खिंचवाये थे, जिन्हें तत्कालीन पुलिस कप्तान (एस.पी.) जोशी जब्त कर लेते हैं। हालाँकि निगेटिव श्री पाध्ये के पास ही था और हाल ही उन तस्वीरों को उन्होंने अपनी वेबसाइट पर प्रस्तुत किया है।   
स्वामी शारदानन्द के अस्थिभस्म को गंगाजी में प्रवाहित करते हुए उनके सचिव डॉ. रमनी रंजन दास नेताजीकहकर उन्हें अन्तिम श्रद्धाँजली देते हैं। पीछे खड़े पुलिस अधिकारी इन्दरपाल सिंह चौंक पड़ते हैं- अब तक तो आप यही कहते आ रहे थे कि ये साधू नेताजी नहीं हैं!
डॉ. दास शुरू से ही (1959-60 से, या हो सकता है 1955 से, जब से नेताजी के सोवियत संघ से भारत में प्रवेश करने की सम्भावना है) स्वामी शारदानन्द के सचिव हैं। हो सकता है... सचिव के रुप में वे भारतीय गुप्तचर सेवा के अधिकारी रहे हों!
डॉ. सुरेश पाध्ये एक ऐसी बात भी बताते हैं, जिससे पता चलता है कि नेताजी के परिजन भी जानते थे कि स्वामी शारदानन्द वास्तव में नेताजी हैं। नेताजी की अप्रकटरहने की इच्छा तथा भारत सरकार का सम्मान बरकरार रखने के लिए वे चुप रहते थे।
डॉ. पाध्ये के कथनानुसार, 1971 में जब वे मुम्बई राजभवन में खोसला आयोग के सामने स्वामी शारदानन्द की सच्चाई बयान करने जा रहे थे (उन दिनों स्वामीजी महाराष्ट्र में सतपुरा के मेलघाट के जंगलों में में रहते थे और डॉ. पाध्ये उनके सम्पर्क में थे), तब आयोग में नेताजी के परिवार के वकील श्री निहारेन्दु दत्त मजुमदार तथा नेताजी के सबसे छोटे भाई श्री शैलेश चन्द्र बोस और उनकी पत्नी ने एम.एल.ए. हॉस्टल में उनसे मुलाकात कर नेताजी की इच्छा का सम्मान रखने का अनुरोध किया था। डॉ. पाध्ये ने बेशक इस अनुरोध का सम्मान रखा था।
वर्षों बाद मुखर्जी आयोग के सामने डॉ. पाध्ये तीन दिनों तक  गवाही देते हैं तथा स्वामी शारदानन्द के नेताजी होने से सम्बन्धित सबूत पेश करते हैं। मगर आयोग ने उनके दावे को बहुत गम्भीरता से लिया हो, ऐसा रपट से पता नहीं चलता।   
*** 
अब उस रहस्यमयी सन्यासी की बात, जो 27 मई 1964 के दिन नेहरूजी के पार्थिव शरीर के पास खड़े थे। यह तस्वीर बम्बई से प्रकाशित होने वाले दमदार साप्ताहिक ब्लिट्जमें छपी थी। बहुतों का मानना है कि ये स्वामी शारदानन्द ही हैं- तब वे दाढ़ी-मूँछ नहीं रखते थे। कहा जाता है कि इस तस्वीर के प्रकाशित होने के बाद ही स्वामी शारदानन्द को अज्ञातवास में जाना पड़ा था तथा बाद में वे दाढ़ी रखने लगे थे। 
दूसरी तरफ, बहुतों का मानना है कि तस्वीर में खड़े सन्यासी वास्तव में कम्बोडियायी बौद्ध भिक्षु धर्मवारा (या, धम्मवारा) महाथेरा हैं। वे नेहरूजी के मित्र थे। वे 1975 तक दिल्ली में ही थे, बाद में अमेरिका चले गये। मेहरौली के पास अशोक मिशननामक आश्रम की स्थापना उन्होंने की थी।
बताया जाता है कि भिक्षु महाथेरा ने 1971 में खोसला आयोग के सामने उपस्थित होकर यह स्वीकार किया था कि 27 मई 1964 वाली तस्वीर में वे ही है।

2.ख) क्या नेताजी ने गुमनामी बाबाका रूप धारण किया था?
प्रचलित कहानी के अनुसार, 1950 के दशक में (हो सकता है, 1955 में ही) दशनामीसम्प्रदाय के एक सन्यासी नेपाल के रास्ते भारत में प्रवेश करते हैं। नीमशहर और बस्ती में वे अपना एकाकी जीवन बिताते हैं। उन्हें भगवानजीके नाम से जाना जाता है।
कहते हैं कि शुरुआती दिनों में एक दूकान में उन्हें किसी ने नेताजीकहकर सम्बोधित कर दिया था, तब से बाहर निकलना उन्होंने बन्द कर दिया और वे दाढ़ी भी रखने लगे।
बताया जाता है कि नेताजी को पहले से जानने वाले कुछ लोग- जैसे, उनके कुछ रिश्तेदार, कुछ शुभचिन्तक, कुछ स्वतंत्रता सेनानी, कुछ आजाद हिन्द फौज के अधिकारी- उनसे गुप-चुप रूप से मिलते रहते थे। खासकर, 23 जनवरी और दुर्गापूजा के दिन मिलने-जुलने वालों की तादाद बढ़ जाती थी।
पहचान खुलने के भय से और कुछ अर्थाभाव के कारण 1983 में- 86 वर्ष की अवस्था में- वे पुरानी जगह बदल देते हैं और फैजाबाद (अयोध्या) आ जाते हैं। (ध्यान रहे, नेताजी का जन्म 23 जनवरी 1897 को हुआ था।)
1975 से ही उनके भक्त बने डॉ. आर.पी. मिश्रा रामभवनमें उनके लिए दो कमरे किराये पर लेते हैं। यहाँ भगवानजी एकान्त में रहते हैं, पर्दे के पीछे से ही लोगों से बातचीत करते हैं और रात के अन्धेरे में ही उन्हें जानने वाले उनसे मिलने आते हैं। यहाँ तक कि उनके मकान-मालिक गुरुबसन्त सिंह भी दो वर्षों में सामने से उनका चेहरा नहीं देख पाते हैं। उनकी देखभाल के लिए सरस्वती देवी अपने बेटे राजकुमार के साथ रहती हैं। भगवानजी के पहले शिष्य महादेव प्रसाद मिश्र की पुत्री थीं सरस्वती देवी। भगवानजी इतने गोपनीय ढंग से रहते हैं कि उन्हें गुमनामी बाबाका नाम मिल जाता है, जो गुमनाम ही रहना चाहता हो। बताया जाता है कि गुमनामी बाबा अपने आप को मृत व्यक्तिकहकर सम्बोधित किया करते थे। शिष्यों के साथ अपनी बातचीत में वे नेताजी से सम्बन्धित ऐसी बातों का जिक्र किया करते थे, जिन्हें सिर्फ नेताजी ही जान सकते थे।
16 सितम्बर 1985 को गुमनामी बाबा का देहान्त होता है। 18 (या 19) सितम्बर को उनके भक्तजन बाकायदे तिरंगे में लपेटकर उनका पार्थिव शरीर सरयू तट के गुप्तार घाट पर ले जाते हैं और तेरह लोगों की उपस्थिति में उनका अन्तिम संस्कार कर दिया जाता है। (यह वही घाट है, जिसके बारे में मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने यहाँ अपना नश्वर शरीर त्यागा था।)
इसके बाद खबर जोर पकड़ती है कि है कि गुमनामी बाबा नेताजी थे। दशनामी सन्यासीउर्फ भगवान जीउर्फ गुमनामी बाबाको नेताजी मानने के पीछे कारण हैं- उनकी कद-काठी, बोल-चाल इत्यादि नेताजी जैसा होना; कम-से-कम चार मौकों पर उनका यह स्वीकारना कि वे नेताजी हैं; उनके सामान में नेताजी के पारिवारिक तस्वीरों का पाया जाना; नेताजी के करीबी रहे लोगों से उनकी घनिष्ठता तथा पत्र-व्यवहार; बात-चीत में उनका जर्मनी, रूस, चीन इत्यादि देशों का जिक्र करना; इत्यादि।
गुमनामी बाबा के सामान को प्रशासन नीलाम करने जा रहा था। नेताजी के भतीजी ललिता बोस, एम.ए. हलीम और विश्वबन्धु तिवारी कोर्ट गये, तब जाकर (अदालत के आदेश पर) मार्च’ 86 से सितम्बर’ 87 के बीच उनके सामान को 24 ट्रंकों में सील किया गया।
26 नवम्बर 2001 को इन ट्रंकों के सील मुखर्जी आयोग के सामने खोले जाते हैं और इनमें बन्द ढाई हजार से ज्यादा (2,673) चीजों की जाँच की जाती है। पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं के अलावे इन चीजों में नामी-गिरामी लोगों- जैसे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरूजी“, पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री तथा राज्यपाल- के पत्र, नेताजी से जुड़े समाचारों एवं लेखों के कतरन, रोलेक्स और ओमेगा की दो कलाई-घड़ियाँ (कहते हैं कि ऐसी ही घड़ियाँ नेताजी पहनते थे), जर्मन (16 गुणा 56) दूरबीन, इंगलिश (कोरोना एम्पायर) टाईपराइटर, कुछ पारिवारिक छायाचित्र, हाथी दाँत का (टूटा हुआ) स्मोकिंग पाईप इत्यादी पाये जाते हैं। यहाँ तक कि नेताजी के बड़े भाई सुरेश बोस को खोसला आयोग द्वारा भेजे गये सम्मन की मूल प्रति भी पायी जाती है।
***
अपनी रिपोर्ट में न्यायाधीश श्री मनोज कुमार मुखर्जी तीन कारणों से गुमनामी बाबाको नेताजीघोषित नहीं करतेः
1. बाबा को करीब से जानने वाले लोग स्वर्गवासी हो चुके हैं, अतः वे गवाही के लिए उपलब्ध नहीं हो सकते;
2. बाबा का कोई छायाचित्र उपलब्ध नहीं है, (इस पुस्तक में प्रस्तुत तस्वीर काल्पनिक है) और
3. सरकारी फोरेंसिक लैब ने उनके हस्तलेखऔर दाँतोंकी डी.एन.ए. जाँच का रिपोर्ट ऋणात्मक दिया है।
ये सात दाँत एक माचिस की डिबिया में रखे पाये गये थे। मुखर्जी आयोग ने नेताजी के परिजनों से नमूने लेकर दो सरकारी प्रयोगशालाओं में इन दाँतों का डी.एन.ए. टेस्ट करवाया था। एक लैब कोई निष्कर्ष नहीं दे पाया, जबकि दूसरे ने परिणाम ऋणात्मक दिया। गुमनामी बाबा के हाथ की लिखावट का मिलान भी नेताजी की लिखावट से करवाया गया था। इसका परिणाम दोनों सरकारीविशेषज्ञों ने ऋणात्मक दिया। हालाँकि लिखावटों की जाँच अनुभवी विशेषज्ञ श्री बी. लाल से भी करवाया गया था और उनका निष्कर्ष था कि दोनों लिखावट एक ही व्यक्ति के हैं!  
देश-दुनिया का हर व्यक्ति भारतीय सरकारीप्रयोगशालाओं की कार्यशैलीको जानता है, अतः कहा यही जाता है कि अच्छा होता, अगर आयोग ने ये जाँच भारत के बाहर के फोरेन्सिक लैबों में भी करवाये होते।
दावा यह भी किया जाता है कि एक अनौपचारिक (ऑफ द रिकॉर्ड) बातचीत में जस्टिस मुखर्जी ने स्वीकार किया था कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे- पक्के सबूतों एवं गवाहों के अभाव में वे इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं कर पा रहे हैं।
***
गुमनामी बाबा नेताजी थे या नहीं, उन्हें आध्यात्मिक शक्तियाँ प्राप्त थीं या नहीं, ये बातें अपनी जगह हैं; मगर यहाँ उनके एक अनोखे कथन का जिक्र किया जा रहा है।
1972 में एक शिष्य से वे पूछते हैं- मेरी उम्र कितनी होगी? शिष्य का उत्तर है- छिहत्तर साल। इस पर वे कहते हैं- ओह, तो अभी छियालिय साल मुझे और रहना है!
1972 में 46 जोड़ने पर 2018 बनता है। साल 2018 आने ही वाला है। पता नहीं, उनके इस कथन के पीछे क्या संकेत रहा होगा! देश में कोई परिवर्तन
***
ऐसी अवधारणायें भी प्रचलित हैं कि नेताजी 1949 में चीन में थे। वहाँ उन्होंने माओत्से-तुंग को क्रान्ति में मदद दी। इसके प्रायः 20 साल बाद में वियेतनाम से अमेरिकियों को खदेड़ने में उन्होंने हो-चि-मिन्ह की मदद की। यहाँ तक कि बाँग्लादेश के निर्माण (1971) में भी उन्होंने परोक्ष रुप से शेख मुजीब की मदद की थी। इन दावों में से कुछ के तार गुमनामी बाबा से आकर जुड़ते हैं।
कुछ स्वतंत्र दावे भी हैं कि किसी ने उन्हें बैंकॉक में देखा, तो किसी ने कहीं और। देखा जाय, तो नेताजी के अन्तर्ध्यान रहस्य को लेकर दर्जनों कहानियाँ हैं। हर कहानी, हर दावे या हर अवधारणा पर विचार सम्भव नहीं है। इस पुस्तक का ऐसा उद्देश्य भी नहीं है।
फिर भी, एक रोचक किंवदन्ती का जिक्र किया ही जा सकता हैः
पुरी के समुद्रतट पर नेहरूजी चहलकदमी कर रहे थे। सामने से आ रहे एक सन्यासी अचानक उनके पास ठहर जाते हैं और मुस्कुराकर कहते हैं, ”और जवाहर, पहचाना?“
नेहरूजी उस सन्यासी के चेहरे की तरफ देखते हैं और लड़खड़ा जाते हैं। इसके बाद वे सही में नहीं सम्भल पाये। बाद में उन्हें पक्षाघात होता है और जल्दी ही वे चल बसते हैं!       
                ***
                आखिर नेताजी का क्या हुआ होगा- इस प्रश्न के उत्तर में हमने कुछ प्रमुख अवधारणाओं का संक्षिप्त विश्लेषण कर लिया। अब भारत-जापान-रूस सरकारों द्वारा नेताजी से जुड़े गोपनीय दस्तावेजों के सार्वजनिक होने के बाद ही पता चल पायेगा कि इनमें से कौन-सी अवधारणा सही है और कौन-सी गलत। हो सकता है कि इनके अलावे कोई नयी बात ही सामने आ जाये!
                यह ठीक है कि रहस्यके आवरण का अपना एक अलग ही आकर्षण होता है; फिर भी, देखा जाय तो हम भारतीयों का यह हक बनता है कि हमें अपने प्रिय नेता के बारे में सही एवं सच्ची जानकारियाँ मिले- चाहे वह जो भी हो, जैसी भी हो!
तो आइये, हम सर्वशक्तिमान से यही प्रार्थना करें कि वह हमारी सरकार को सद्बुद्धि प्रदान करे कि वह जल्द-से-जल्द न केवल स्वयं नेताजी से जुड़े गोपनीय दस्तावेजों को प्रकाशित करे, बल्कि जापान और रूस सरकारों से भी ऐसा ही करने के लिए आधिकारिक रुप से अनुरोध करे...
आमीन... एवमस्तु...
***** 






5.1(क)अतिरिक्त जानकारी: स्तालिन का अन्त


स्तालिन को जानने वाले बहुत-से लोगों का मानना है कि वे हिटलर से भी ज्यादा निष्ठुर और निर्दय थे। उन्हें एक से दो करोड़ लोगों की मौत का जिम्मेदार ठहराया जाता है। हिटलर ने यातना शिविरों के गैस चेम्बरमें लोगों को मरवाया था, तो स्तालिन के पास बर्फीले साइबेरिया का निर्वासनथा। 
मुसोलिनी जनता के हाथों मारे गये थे; हिटलर को आत्महत्या करनी पड़ी थी; फिर क्या ये तीसरे तानाशाह- स्तालिन- शान्ति से स्वाभाविक मौत मरे? शायद नहीं।
28 फरवरी 1953 को उनके उत्तराधिकारी ख्रुश्चेव और एन.के.वी.डी. (गुप्त पुलिस) के मुखिया बेरिया शाम 16:00 बजे उन्हें छोड़कर जाते हैं।
अगली सुबह 1 मार्च को 10:00 बजे तक जब उनके कमरे का दरवाजा नहीं खुलता है, तो गार्ड चिन्तित होते हैं, मगर किसी की मजाल नहीं है कि कोई उनके कमरे में झाँक ले!
जो भी हो, रात 22:00 बजे उन्हें कमरे में फर्श पर पड़े पाया जाता है- अपने ही पेशाब में लथपथ। उनकी टूटी घड़ी 18:30 का समय बता रही थी। यानि उन्होंने अपने हिस्से का कष्ट भोग लिया था!
उन्हें चिकित्सा पहुँचाने में सम्भवतः जानबूझ देर की जाती है- अगली सुबह 07:00 से 10:00 बजे के बीच चिकित्सा मुहैया करवायी जाती है। डॉक्टर पाते हैं कि उनपर पक्षाघात का असर है, साँस लेने में तकलीफ है और वे रक्त की उल्टियाँ कर रहे हैं।
स्तालिन ने अपने पुराने डॉक्टरों को जेल में डलवा रखा था। जब नये डॉक्टर उनसे सलाह लेने जाते हैं, तो स्वाभाविक रुप से वे गलत ईलाज की सलाह देते हैं।
5 मार्च 1953 को 21:50 तक तड़पने के बाद स्तालिन प्राण त्यागते हैं। उनकी बेटी का कथनः
उनकी मौत का दर्द भयानक था। हम देख रहे थे और उनका दम घुट रहा था।
*****



24 comments:

  1. साथियों,
    जय हिन्द.
    20 वर्षों से अधिक पुराने गोपनीय दस्तावेजों को सार्वजनिक करने का कानून जब तक देश में बन नहीं जाता है; या जब तक नेताजी से जुड़े गोपनीय दस्तावेज (सूचना के अधिकार के तहत) उजागर नहीं हो जाते, तब तक परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर अनुमान लगाने के अलावे और कोई चारा नहीं है. इस आलेख में भी यही किया गया है. यह एक अनुमान है, जो दस्तावेजों के उजागर होने पर गलत भी साबित हो सकता है.
    दूसरी बात, अगर आलेख की किसी बात/विश्लेषण से किसी को कष्ट पहुँचा हो, तो मैं हृदय से माफी माँगता हूँ.
    तीसरी बात, कहानी को यहीं समाप्त हो जानी चाहिए, मगर इसके आगे चार और अध्याय (देर-सबेर ही सही) जोड़ने का इरादा है. वे अध्याय हो सकते हैं- ‘आजाद हिन्द सैनिकों का क्या हुआ?’, ‘ऐसे आयी आजादी’, ‘गाँधी-नेहरू और सुभाष’, ‘तीनों जाँच-आयोगों के बारे में’, ‘यह देश और इसकी नियति’ और ‘नेताजी के सपने को पूरा करना है’.
    ईति, धन्यवाद.
    जयदीप

    ReplyDelete
  2. भारतीयों को हमेशा से ही गद्दारी मिली है. और उनके ही हमवतनों ने यह काम किया है. बोस, मुखर्जी, शास्त्री, भगत इत्यादि हजारों ऐसे नाम हैं जो हमवतनों की ही गद्दारी के शिकार हुये. और सरकार आज भी यही कर रही है.

    ReplyDelete
  3. जयदीप भाई ,
    सच कुछ भी रहा हो ....कभी ना कभी तो सामने आएगा ही |
    आप ने इस ब्लॉग के माध्यम से हम लोगो को नेता जी के बारे में जितनी जानकारी दी है उसके लिए आप के कर्ज़दार है हम सब !
    आपका बहुत बहुत आभार और आपको नमन करता हूँ देश के प्रति आपकी इस सेवा के लिए !

    ReplyDelete
  4. बहुत सुंदर जानकारी दी आप ने, सच हे असली नेता ओर देश भगत सब के सब एक दम से गुम हो गये, जब कि इन्ही का अधिकार बनता था देश को समभालंए ना, ओर गद्दार ओर अग्रेजो के चाप्लुसो ने फ़िर से देश की बागडोर समभाल ली, जिस का फ़ल हम आज भी भुगत रहे हे, सलाम हे मेरे इन महान नेताओ को, सुभाष चंद्र जी को, आप का धन्यवाद

    ReplyDelete
  5. अगर आप नेताजी के ‘अन्तर्ध्यान रहस्य’ में रूची रखते हैं तथा इस बारे में अधिक जानना चाहते हैं, तो कृपया इन वेबसाईटों पर आयें:-
    श्री अनुज धर का वेबसाईट है: http://missionnetaji.org/ (मैं ‘नाज़-ए-हिन्द सुभाष’ को वहाँ भी प्रकाशित कर रहा हूँ.)
    श्री अजमेर सिंह रन्धावा के वेबसाईट हैं: http://www.deathofsubhashbose.com/deathofsubhashbose.php और http://antimsatyasubhashbose.blogspot.com/
    इसके अलावे डॉ. सुरेश पाध्ये, जो 1965 से 1977 तक नेताजी / स्वामी शारदानन्द के सम्पर्क में थे, का वेबसाईट है: http://netajibosemysteryrevealed.org/
    धन्यवाद.

    ReplyDelete
  6. जय हिन्द.

    aapka bahut bahut abhar ,aapki vajahse itna kuch jaanneko mila.

    Neta ji ko koti koti naman

    ReplyDelete
  7. NETAJI IS A VERY RESPECTFUL WORD AND ALL KNOW NETAJI MEANS SUBHASH CHANDER BOSE BUT WHAT ABOUT NETA NETA IS KNOWN AS CHOR BHRUST,BALATKARI,DESHDROHI HAVING CRORERS OF RS IN SWISS BANK BHAGWAN SARE NETA LE KAR EK NETAJI DE DE

    ReplyDelete
  8. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  9. Netaji ke swargwas ke baad to sarkar ko saNch batana chahiye tha, aakhir janta ka bhi saNch janane ka hak banta hai.

    ReplyDelete
  10. mind boggling. shame on the Indian government which cannot own its son who was a maverick and sacrificed his life for the country . shame to its people too. All the sons and daughter as well as citizens of india it can happen to u as well..........

    ReplyDelete
  11. प्रिय देशवासियों!
    वास्तव मे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जैसा वीर सपूत भारत वर्ष की जमीन पर शताब्दियों पहले तक पैदा नहीं हुआ था और शायद होगा भी नहीं। देश के लिए पद-प्रतिष्ठा, जवानी, धन-दौलत, सुख-सुविधा सबकुछ त्याग कर देने वाले नेता जी को क्या मिला- गुमनामी की मौत? पता नहीं मरने के बाद उनको कफन भी नसीब हुआ होगा या नहीं। हमारी इतिहास की किताबों मे उनके जीवन पर एक पूरा अध्याय भी नहीं है! वास्तव मे सुभाष चन्द्र बोस जी सच्चे नेता थे। आज दोनों हाथ जोड़कर वोट मांगने वाले नेता, नेता नहीं भिखारी हैं, भिखारी से भी गए बीते! सुभाष चन्द्र बोस जी ने देश को आज़ाद कराने के लिए जो त्याग किया था वो प्रतिफल मे कुछ पाने के लिए नहीं किया था। सुकरात को विष का प्याला पीना पड़ा था, जीसस को क्रूस पर लटकाया गया था, सिख-गुरु श्री अर्जुन देव की शहादत साबित करती है की सत्य की राह पर चलने वालों को कांटे मिलते हैं, फूल नहीं। यदि हम सच्चाई और ईमानदारी से इस देश के लिए सुभाष चन्द्र बोस जी का शतांश भी कर सके, भ्रष्टाचार, अन्याय के विरोध मे, तो यही उनको हमारी सच्ची श्रध्द्धांजली होगी।

    ReplyDelete
  12. कुछ बाते जो मेरे मन है में भी बता दूँ.आज़ादी के अन्द्लोना में मुख्य क्रन्तिकारी भूमिका निभाने वाले हमारे अमर जवान शहीद भगत सिंह भी है अगर पुरे भारत में किसी गरीब या आजकल केक्सिस बने आमिर के घर में जाओगे तो कुछ फोटो अभी दीवार पर लटकाए दीखते है.नेताजी,शहीद,और आज़ाद,शिवाजी और राणा प्रताप मगर भारत का राष्ट्रपिता गाँधी को बता दिया है.कुछ जिनमे तो मध्ययुग के थे जबकि तिन आज़ादी के लड़ाई के समय के

    परन्तु बात पत्ते पे यहाँ अटकती है के भगत सिंह को फंसी दिलाने वाला कोण था ? तो अकेला गाँधी क्यों के आज़ादी की लड़ाई में ये भगत सिंह की साम्यवादी लड़ाई चाहते ही नहीं थे और बिरला बजाज टाटा और कही नामी अनामी घराने से निकलने वाली आवाजो ने ये सब नौजवानों को शहीद कर दिया ........अगर भगत सिंह और सुभाष बाबु जिन्दा होते तो २ विश्व युद्ध में भारत में आंतरविग्रह हो जाता तो इंग्लेंड में माल एक्सपोर्ट करने वाले ये स्थापित हितो का क्या होता और ये स्थापित हितो के चलते ही भगत सिंह को फंसी हो गई और उन के जरिये सुभाष की लड़ाई को नाकाम बना दिया इन को बस एक ही मतलब था के देश में हमको ही पूछे और हम ही देश के राष्ट्रपति प्रधानमंत्री राष्ट्रपिता बने रहे ..........

    ReplyDelete
  13. Netaji Subhas Chandra Bose Is Still Alive,At This Very Moment...Hail And Hearty!!!

    ReplyDelete
  14. जब शहीदों की अर्थी उठे देशवालो तुम आँसू बहाना नही!
    जब मनाओ आज़ाद भारत का दिन उस घड़ी तुम हमें भूल जाना नही!!
    लेकिन आज हर कोई भूल गया है.

    ReplyDelete
  15. many many thanks to avail such contents about Netaji.Netaji were real patriot of Indian freedom.

    ReplyDelete
  16. Thanks for such a wonderful information, i liked it

    ReplyDelete
  17. BHUPENDER JUNEJA SACH KO SUB KE SAMANE AANA CHAHIYE HUMARI SARKAR KYU DARTE HAI AB 125 SAAL KE BAD TO NETA JEEWAPIS NAHE AA SAKTE TO FIR SACH KYU GAYAB HAI.

    ReplyDelete
  18. sach ka pta ni prrr sarkar chor hai

    ReplyDelete
  19. Japan sold Netaji and Netaji-dummy to British;
    In WW-I, Japan was an ally of British. Before WW-II, Japan-US trade war and political war started, this led to actual war between US and Japan. So British became an enemy to Japan by diplomatic manipulation as US - British alliance was there. After WW-II, Japan revived their old connection with British via spies. Japanese and British spies were enough linked before WW-II. Japanese spies agreed to eliminate Netaji. Motive was to appease the British and purchase security for Japan royal family. Thus, Japan sold Netaji to British and British eliminated him. The false news of air crash was Japan’s fabrication. In any controversial case, liar is to be suspected first.
    Netaji’s plan to start second independence war with the help of USSR was known to Japan. There was enough scope for British and Japanese spies to develop a common minimum program against pro-communist agenda of Netaji. Why should Japanese imperialism agree to patronize emergence of independent India as a permanent communist ally? Is it not more logical to fulfill British condition and purchase favor? Why Japan royal family was not tried as a war criminal? What is the mystery behind this favor?
    There is another point about gumnami baba. Who was he? Gumnami baba was a dummy created as a part of common minimum program of Japanese imperialism and British imperialism. In axis camp, creation of dummy by plastic surgery was a common practice. Hitler and Mussolini were having number of dummies. Japan sold Netaji-dummy to British. British deputed this dummy at faizabad of Uttar Pradesh, with a purpose to create confusion that as if Netaji’s death or life is doubtful. The confusion prevented the nation to be doubtful about role of Japan or British. So gumnami baba of faizabad is a common creation of Japanese spies and British spies. Never had he told the truth. If he had told anything, that must be lie. In a controversial case, liar is to be suspected. So, Japan sold Netaji to British and British executed him in secret. Japan sold Netaji-dummy to British and British deputed him at faizabad of Uttar-Pradesh. Japan surrendered to US-UK side on 15th august 1945. Netaji’s last flight was on 18th august 1945. A surrendered Japan was no longer an ally of azad hind. They worked as per their new mentors, the British.

    ReplyDelete

  20. इस पोस्ट में ऐसा जिक्र है कि देहरादून के तत्कालीन पुलिस एस.पी. जोशी ने स्वामी शारदानन्द के अन्तिम संस्कारों के छायाचित्रों को निगेटिव सहित जब्त कर लिया था। इन चित्रों को छायाकार श्री एस. जोगी ने खींचा था और जैसा कि डॉ. सुरेश पाध्ये से मुझे जानकारी मिली थी, श्री जोगी को उन्होंने ही (डॉ. पाध्ये ने) नियुक्त किया था।

    फिलहाल यहाँ मैं थोड़ी-सी भूल-सुधार करना चाहूँगा। हाल ही में मुझे डॉ. सुरेश पाध्ये साहब से जानकारी मिली कि देहरादून के डी.एस.पी. ने “निगेटिव” को जब्त किया था, जबकि निगेटिव से फोटो तैयार कर लिये गये थे।

    डॉ. पाध्ये ने अपनी वेबसाइट पर जून’2012 में उन सभी छायाचित्रों को प्रस्तुत किया है। सभी चित्रों को देखने के लिए आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सकते हैं-

    http://netajibosemysteryrevealed.org/section-12-funeral-of-netaji-subhash-chandra-bose-at-rishikesh/

    वहाँ आपको एक रंगीन छायाचित्र भी मिलेगा, जिसे एक स्पेनवासी ने खींचा था।
    ***
    श्री अनुज धर तथा ज्यादातर भारतीय जहाँ “गुमनामी बाबा” के बारे में ऐसा मानते हैं कि वे नेताजी थे; वहीं डॉ. सुरेश पाध्ये तथा श्री अजमेर सिंह रन्धावा “स्वामी शारदानन्द” को नेताजी बताते हैं। मैंने अपनी उपर्युक्त पोस्ट में दोनों मान्यताओं का जिक्र बिना किसी पूर्वाग्रह के किया है और व्यक्तिगत रुप से मुझे “स्वामी शारदानन्द” वाली अवधारणा सही जान पड़ती है- ऐसा मैंने लिखा है।
    आगे जब तक भारत सरकार गोपनीय दस्तावेजों को जाहिर नहीं करती, यह रहस्य बना ही रहेगा।
    ईति।

    पुनश्च:
    बता दूँ कि डॉ. पाध्ये के इस पोस्ट की जानकारी मुझे शिवम मिश्रा जी ने बीते नवम्बर में ही दे दी थी; मैं ही इसका जिक्र यहाँ करने में देर कर बैठा।

    ReplyDelete
    Replies
    1. जैसा कि श्री अजमेर सिंह रन्धावा साहब ने स्वयं जानकारी दी है, स्वीडेन वासी पर्यटक ने स्वामी शारदानन्द जी के अन्तिम संस्कार का रंगीन चित्र उन्हें अगस्त 2012 में भेजा था. उस चित्र को उन्होंने अपने ब्लॉग में शामिल कर रखा है.
      http://subhashafter1945.blogspot.in/

      Delete
  21. sacche saputo ko desh ki mudra par phota ki ya mahatma kahlwane ki tamnna nahi ,,,,,,vo to watan pe gumnami me mit jate hai,,,parwano me hi hasrat hoti hai jal jane ki,,,,,,,,,,,,,,,,,salam 1 sacche deshbhakt ko,,,,,,,,

    ReplyDelete
  22. ~!~ गुरुः ब्रह्मा गुरुः विष्णु गुरुः देवो महेशरा

    गुरुः सछात परम् ब्रह्म , तस्मे श्री गुरुः नमः ~!~

    ~!~ सब के सब नेता के नाम पर कलंक हैं ?
    नेता नाम हैं नेत्रत्व का !!
    नेता नाम हैं निर्भीकता का !!
    नेता नाम हैं विश्व को अपना लोहा मनवाने का !!
    नेता नाम हैं एक उद्घोष का !!
    नेता नाम हैं '' सुभाषचन्द्र '' बोष का !!
    ~!~ अमित आनंद ~!~

    ReplyDelete