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Friday, October 15, 2010

4.7 नेताजी सोवियत संघ में ही थेः परिस्थितिजन्य साक्ष्य




इस बात को यहाँ एक बार फिर रेखांकित किया जा रहा है कि जब तक भारत सरकार खुद प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की गोपनीय आलमारियों में कैद नेताजी से जुड़े दस्तावेजों को सार्वजनिक नहीं करती और रूस तथा जापान सरकारों से ऐसा ही करने का अनुरोध नहीं करती, तब तक बहुत-सी बातें स्पष्ट नहीं होंगी, और तब तक हमें परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के तार्किक विश्लेषण के आधार पर घटनाक्रमों का अनुमानही लगाना पड़ेगा- कोई और चारा नहीं है।
वैसे, इस मामले में अब ज्यादा भरोसा रूस और जापान सरकारों पर रह गया है। भारत में हमारे प्रशासनिक अधिकारीगण एक-एक कर नेताजी से जुड़े दस्तावेजों को नष्ट कर रहे हैं। जैसे कि फाइल संख्या ‘12(226)/56, विषय- सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु की परिस्थितियाँके बारे में बाकायदे शपथपत्र दाखिल करके अधिकारियों ने मुखर्जी आयोगको यह बाताया कि इसे वर्ष 1972 में ही नष्ट कर दिया गया था- वह भी बिना प्रतिलिपि तैयार किये।
जरा सोचिये- 1972 में! उस वक्त खोसला आयोगइसी विषय पर जाँच कर रहा था!
इस प्रकार, नेहरूजी के समय के प्रधानमंत्री की विशेष फाइलों’ (PM's Special Files) में से ज्यादातर को- जो नेताजी से जुड़ी थीं- इन्दिराजी के समय में खो गयीं या नष्ट कर दे गयींबताया जाता है।
इन फाइलों को नेहरूजी के निजी सचिव मो. युनूस देखते थे। नेहरूजी ने अपने ये फाइल 1956 में (खुदके द्वारा) गठित शाहनवाज आयोगको भी नहीं देखने दिये थे।
सच तो यह है कि इन फाईलों के दस्तावेज अगर प्रकाशित हो जाते, तो आज एक के बाद एक करके तीन जाँच आयोगों के गठन की नौबत ही नहीं आती!  
बात निकलती है, तो दूर तलक जाती है। इसे हम भारतवासियों का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि हम आज तक सुभाष चन्द्र बोस ही नहीं, लाल बहादूर शास्त्री और श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मौतों पर से भी पर्दा नहीं हटा पाये हैं।
खैर, ये बातें फिर कभी।
***
फिलहाल, वे परिस्थितिजन्य साक्ष्य, जिनसे पता चलता है कि नेताजी को ले जाने वाला विमान सकुशल मंचुरिया पहुँचा था और नेताजी वहाँ से सोवियत संघ में प्रवेश कर गये थेः

ब्रिटिश प्रधानमंत्री का निर्णय
ब्रिटेन में विश्वयुद्ध के बाद हुए चुनाव में युद्ध से त्रस्त ब्रिटिश जनता युद्धकालीन प्रधानमंत्री चर्चिल को नकार देती है और विरोधी पक्ष के क्लिमेण्ट एटली को अपना अगला प्रधानमंत्री चुनती है।
23 अगस्त 1945 को भारत सरकार के गृह मंत्रालय के सर आर.एफ. मुडि नेताजी से कैसे निपटा जाय’ (^How to deal with Bose*)- विषय पर एक रपट तैयार करते हैं। (अत्यन्त गोपनीय पत्र संख्या- 57, दिनांक- 23 अगस्त 1945।)
रपट सर ई. जेनकिन्स को सम्बोधित है।
(ब्रिटेन में एक बहुत अच्छा कानून है कि एक निश्चित अन्तराल- 30 वर्ष- के बाद गोपनीयदस्तावेजों को सार्वजनिक किया जा सकता है। 1976 में सार्वजनिक हुए दस्तावेजों से ही यह पता चला था कि ब्रिटेन ने तुर्की स्थित अपने एस.ओ.ई. को नेताजी की हत्याकर देने का आदेश दिया था, रंगून से सिंगापुर रवाना होने वाली अपनी सेना को नेताजी से मौके पर निपट लेनेका निर्देश दिया था, और ब्रिटिश जासूसों ने तेहरान और काबुल के सोवियत दूतावासों के हवाले से खबर दी थी कि बोस रशिया में हैं। ...अपने देश में ऐसे किसी कानून की अपेक्षा वर्तमान व्यवस्था के अन्तर्गत तो नहीं ही की जा सकती।) 
वायसराय इस रपट को ब्रिटेन की संसद में पेश करते हैं।
मंत्रीपरिषद इस रपट पर टिप्पणी लिखता हैः
रूस ने विशेष परिस्थितियों में बोस को स्वीकार कर लिया होगा। अगर ऐसा है, तो हमें उन्हें वापस नहीं माँगना चाहिए।“ (Russia may accept Bose under special circumstances- If that is the case, we shouldn't demand him back.)
एटली इस पर निर्णय लेते हैंः
उन्हें वहीं रहने दिया जाय, जहाँ वे हैं।“ (Let him remain where he is now-)
एटली यह निर्णय अक्तूबर 1945 में लेते हैं। यानि नेताजी अक्तूबर’45 तक तो जीवित थे ही।
               
नेहरूजी ने एटली को क्या लिखा और किस आधार पर लिखा?
                26 या 27 दिसम्बर 1945 को नेहरूजी आसिफ अली के निवास पर बैठकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लिमेण्ट एटली के नाम एक पत्र टाईप करवाते हैं। पत्र का मजमून हैः 
                ”श्री क्लिमेण्ट एटली
                ब्रिटिश प्रधानमंत्री
                10 डाउनिंग स्ट्रीट, लन्दन
प्रिय मि. एटली,
अत्यन्त भरोसेमन्द स्रोत से मुझे पता चला है कि आपके युद्धापराधी सुभाष चन्द्र बोस को स्तालिन द्वारा रूसी क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति दे दी गयी है। यह सरासर धोखेबाजी और विश्वासघात है। रूस चूँकि ब्रिटिश-अमेरीकियों का मित्र है, अतः उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था।
कृपया इस पर ध्यान दें और जो उचित तथा सही समझें वह करें।
आपका विश्वासी,
जवाहर लाल नेहरू
अब देखें कि नेहरूजी के अत्यंत भरोसेमन्द सूत्रने क्या लिखा है। यह एक हस्तलिखित नोट हैः
नेताजी विमान द्वारा सायगन से चलकर 23 अगस्त 1945 को दोपहर 13:30 पर मंचुरिया के दाईरेन में पहुँचे। विमान एक जापानी बमवर्षक था। उनके साथ बड़ी मात्रा में सोने की छड़ें और गहने थे। विमान से उतरकर उन्होंने केले खाये और चाय पी। वे तथा चार अन्य व्यक्ति, जिनमें एक जापानी अधिकारी सिदेयी थे, जीप में बैठे और रूसी सीमा की ओर चले गये। करीब तीन घण्टे के बाद, जीप वापस लौटी और पायलट को टोक्यो वापस लौट जाने का निर्देश दिया गया।
उपर्युक्त जानकारी हमें आई.एन.ए. डिफेन्स कमिटीके कॉन्फिडेन्शियल स्टेनो श्री श्यामलाल जैन के उस बयान से मिलती है, जो उन्होंने खोसला आयोग’ (1970 में गठित) के सामने- बाकायदे शपथ उठाकर- दिया था। श्री जैन नेहरूजी के उस अत्यंत भरोसेमन्द सूत्रका हस्ताक्षर नहीं पढ़ पाये थे, क्योंकि वह स्पष्ट नहीं था। मगर सामग्रीउन्हें याद रह गयी। एटली को लिखे पत्र का मजमून तो उन्हें याद रहना ही था, क्योंकि नेहरूजी के लेटरहेड की चार प्रतियों पर उन्होंने खुद इसे टाईप किया था।
अगर नेहरूजी के अत्यंत भरोसेमन्द सूत्रकी जानकारी तथा श्री जैन की याददाश्त एकदम सही है, तो इसका मतलब यह हुआ कि नेताजी 18 अगस्त से 22 अगस्त 1945 तक ताईपेह में ही गुप्त रुप से रह रहे थे।
जाहिर है- इसी दौरान विमान-दुर्घटना के नाटकके सभी किरदारोंने अपने-अपने संवादयाद किये होंगे।
22 को इचिरो ओकुराके दाह-संस्कार के बाद 23 अगस्त की सुबह विमान नेताजी और सिदेयी को लेकर ताईपेह से मंचुरिया की ओर रवाना हुआ होगा। जब विमान सकुशल दाईरेन में उतर गया होगा और रूसियों के साथ नेताजी का सम्पर्क कायम हो गया होगा, तब जाकर जापान ने विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु की खबर को प्रसारित किया होगा।
जहाँ तक जीप पर नेताजी के अलावे चारऔर व्यक्तियों के सवार होने की बात है, इनमें एक तो सिदेयी ही थे; दूसरे, ओम्स्क शहर से आये आजाद हिन्द सरकार के कौन्सुल जेनरल काटोकाचु रहे होंगे। बाकी दो में से- हो सकता है- एक स्थानीय मार्गदर्शकहो और दूसरा काटोकाचु के साथ आया कोई रूसी अधिकारी।
जहाँ तक उस विमान की बात है, बताया जाता है कि वह विमान टोक्यो लौटते वक्त समुद्र के ऊपर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। नेताजी को सकुशल गंतव्य तक पहुँचाने का मिशन पूरा करने के बाद पायलट और को-पायलट ने- सबूत मिटाने के लिए- विमान सहित समुद्र में जलसमाधिलेने का निर्णय लिया हो, तो इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं।
सिदेयी चूँकि नेताजी के साथ थे, अतः अनुमान लगाया जा सकता है कि वे भी नेताजी के साथ सदा के लिए अज्ञातवास में चले गये होंगे।
               
विजयलक्ष्मी पण्डित मास्को से क्या खबर लायीं थीं?
जब देश आजाद हुआ, तब नेहरूजी की बहन विजयलक्ष्मी पण्डित मास्को में थीं। उन्हें सोवियत संघ में भारत की राजदूत घोषित कर दिया जाता है।
जैसा कि बताया जाता है- मास्को से लौटकर एकबार पालम हवाई अड्डे पर श्रीमती पण्डित ने कहा- वे सोवियत संघ से ऐसी खबर लायी हैं, जिसे सुनकर देशवासियों को उतनी ही खुशी मिलेगी, जितनी की आजादी से मिली थी।
कूटनीति के अनुसार, विदेश से लायी गयी किसी बड़ी खबर को आम करने से पहले (राजदूत को) देश के प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री से सलाह लेनी पड़ती है। भारत के प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री- दोनों नेहरूजी ही हैं। सो जाहिर है, विजयलक्ष्मी पण्डित फिर कभी वह आजादी के समान प्रसन्नता देने वाली खबरदेशवासियों को नहीं सुना पायीं।
इसी कहानी का एक दूसरा संस्करण भी है, जिसके अनुसार संविधान सभा में श्रीमती पण्डित कहती हैं कि उनके पास एक महत्वपूर्ण समाचार है, जो सारे देश में बिजली की तरंग प्रवाहित कर सकती है। इस पर नेहरूजी उन्हें बैठ जाने का ईशारा करते हैं।
वह घटनाक्रम या बात चाहे जो भी रही हो, मगर इतना है कि-
1. विजयलक्ष्मी पण्डित को नेहरूजी मास्को से हटाकर वाशिंगटन भेज देते हैं- यानि उन्हें अमेरीका का राजदूत बना दिया जाता है। और
2. 1970 में गठित खोसला आयोगइस विषय पर बयान देने के लिए श्रीमती पण्डित को बुलाता है, मगर वे उपस्थित नहीं होतीं।
               
डॉ. राधाकृष्णन का राजदूत से उपराष्ट्रपति बननाः माजरा क्या था?
मास्को में भारत के अगले राजदूत बनकर जाते हैं- डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन।
स्तालिन अब भी सोवियत संघ के राष्ट्रपति हैं। वे अक्सर राधाकृष्णन से मिलते हैं और दर्शनशास्त्र पर चर्चा करते हैं।
प्रचलित कहानी के अनुसार, स्तालिन ने राधाकृष्णन को साइबेरिया जाकर नेताजी को देखनेकी अनुमति प्रदान कर दी थी। उन्हें कुछ दूरी से नेताजी को देखना था- बातचीत नहीं करनी थी।
इस कहानी के एक दूसरे संस्करण के अनुसार, डॉ. राधाकृष्णन मास्को में नेताजी से मिले थे और नेताजी ने बाकायदे उनसे अनुरोध किया था कि वे उनकी (नेताजी की) भारत वापसी की व्यवस्था करें। 
सच्चाई चाहे जो हो, मगर इतना सच है कि भारत में इन खबरों ने ऐसा जोर पकड़ा कि डॉ. राधाकृष्णन को मास्को से बुलाना पड़ गया।
यहाँ तक तो बात सामान्य है- वह खबर एक अफवाह हो सकती है।
मगर इसके बाद नेहरूजी डॉ. राधाकृष्णन को अचानक भारत का उपराष्ट्रपति बनवा देते हैं। जबकि काँग्रेस में उनसे वरिष्ठ कई नेता मौजूद हैं, जिनका स्वतंत्रता संग्राम में भारी योगदान रहा है।
मौलाना आजाद के मुँह से निकलता भी है- क्या हम सब मर गये हैं?“
बाद के दिनों में खोसला आयोगडॉ. राधाकृष्णन को भी सफाई देने के लिए बुलाता है। वे अस्पताल में आरोग्य लाभ कर रहे हैं, मगर डिक्टेटकरके वे अपना बयान टाईप करवा सकते थे- कि वह अफवाह सच्ची थी या झूठी; या आयोग खुद चेन्नई जाकर अस्पताल में उनकी गवाही ले सकता था... मगर ऐसा कुछ नहीं होता।
ऐसा नहीं है कि डॉ. राधाकृष्णन ने कभी कुछ कहा ही नहीं होगा। कलकत्ता विश्वविद्यालय के डॉ. सरोज दास और डॉ. एस.एम. गोस्वामी का कहना था कि डॉ. राधाकृष्णन ने उनसे नेताजी के रूस में होने की बात स्वीकारी थी।

साइबेरिया जेल का खिल्सायी मलंग
सोवियत साम्यवादी पार्टी के क्राँतिकारी सदस्य तथा भारत की साम्यवादी पार्टी के संस्थापकों में से एक अबनी मुखर्जी साइबेरिया की जेल में नेताजी के बगल वाले सेल में ही बन्द थे।
जेल में नेताजी खिल्सायी मलंगके नाम से जाने जाते थे।
अबनी, वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय (सरोजिनी नायडु के भाई) के साथी थे। दोनों को स्तालिन ने 1937 से ही कैद कर रखा था। बाद में दोनों को स्तालिन मरवा देते हैं।
खिल्सायी मलंग वाली बात अबनि मुखर्जी ने अपने बेटे जॉर्जी मुखर्जी को बतायी थी और बाद में जॉर्जी ने नेहरूजी के मंत्रीमण्डल में मंत्री रहे सत्यनारायण सिन्हा को यह बात बतायी।
श्री सिन्हा भारत आकर इसे एक ताजी खबर समझकर नेहरूजी को इसके बारे में बताते हैं। मगर वे चकित रह गये यह देखकर कि खबर पर प्रसन्न होने के बजाय नेहरूजी उन्हें डाँटना शुरु कर देते हैं।
तब से दोनों के बीच सम्बन्ध बिगड़ जाते हैं। श्री सिन्हा ने इस घटना का जिक्र अपनी किताब ('Netaji Mystry') में किया है। खोसला आयोग को भी उन्होंने इसकी जानकारी दी थी।

अय्यर का नोट
1952 में एस.ए. अय्यर (नेताजी के एक सहयोगी, जिनको ब्रिटिश-अमेरिकी शक्तियाँ गिरफ्तार नहीं करती और जिनके बारे में यह माना जाता है कि वे बाद में नेहरुजी के विश्वासपात्र बन जाते हैं) टोक्यो यात्रा पर जाते हैं। वहाँ से लौटकर एक व्यक्तिगत नोट वे नेहरूजी को सौंपते हैं, जो इस प्रकार हैः
मैंने इसबार एक बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी एकत्र की है। कर्नल टाडा ने मुझे बताया कि युद्ध के अन्त में जब जापान ने आत्मसमर्पण किया, तब तेराउचि ने नेताजी की मदद की जिम्मेवारी ली और मुझे (टाडा को) चन्द्र बोस के पास उन्हें रूसी सीमा पर पहुँचने की सूचना देने के लिए भेजा- वहाँ उन्हें सारी मदद मिल जायेगी। व्यवस्था की गयी कि चन्द्र बोस सिदेयी के विमान से जायेंगे। जेनरल सिदेयी दाईरेन तक चन्द्र बोस की देख-भाल करेंगे, उसके बाद उन्हें अपने बल पर रूसियों से सम्पर्क करना होगा। जापानी दुनिया के सामने घोषणा कर देंगे कि नेताजी दाईरेन से लापता हो गये। इससे मित्रराष्ट्र वालों की नजरों में वे (जापानी) बरी हो जायेंगे।
कर्नल टाडा के इस कथन से अनुमान लगाया जा सकता है कि-
16 से 19 अगस्त 1945, शाम चार बजे तक जापान की योजना सिर्फ इतनी थी कि नेताजी को दाईरेन में उतारकर नेताजी के लापता होनेकी खबर प्रसारित कर देनी है। यह आसान था।
19 अगस्त को शाम चार बजे नानमोन अस्पताल में इचिरो ओकुरानामक एक ताईवानी सैनिक की मौत हो जाती है और किसी के दिमाग में यह योजना कौंधती है कि क्यों न इचिरो ओकुराके अन्तिम संस्कार को नेताजी का संस्कार बता दिया जाय?
नयी योजना काफी जल्दीबाजी में बनी होगी और इसलिए न तो हवाई पट्टी पर विमान-दुर्घटना के चिन्ह छोड़े जा सके; न ए.टी.सी. के लॉगबुकमें दुर्घटना की प्रविष्टि बनायी जा सकी, और न ही सिदेयी, ताकिजावा और आयोगी के शवों के (गायब होने के) बारे में कोई कहानी गढ़ी जा सकी।

नेहरूजी को माउण्टबेटन की चेतावनी
माउण्टबेटन के बुलावे पर नेहरूजी जब 1946 में (भावी प्रधानमंत्री के रूप में) सिंगापुर जाते हैं, तब गुजराती दैनिक जन्मभूमिके सम्पादक श्री अमृतलाल सेठ भी उनके साथ होते हैं।
लौटकर श्री सेठ नेताजी के भाई शरत चन्द्र बोस को बताते हैं कि एडमिरल लुई माउण्टबेटन ने नेहरूजी को कुछ इन शब्दों में चेतावनी दी हैः
हमें खबर मिली है कि बोस विमान दुर्घटना में नहीं मरे हैं, और अगर आप जोर-शोर से उनका यशोगान करते हैं और आजाद हिन्द सैनिकों को भारतीय सेना में फिर से शामिल करने की माँग करते हैं, तो आप नेताजी के प्रकट होने पर भारत को उनके हाथों में सौंपने का खतरा मोल ले रहे हैं।
इस चेतावनी के बाद नेहरूजी सिंगापुर के शहीद स्मारक’ (नेताजी द्वारा स्थापित) पर माल्यार्पण का अपना पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम रद्द कर देते हैं। बाद में वे कभी नेताजी की तारीफ नहीं करते; प्रधानमंत्री बनने पर आजाद हिन्द सैनिकों को भारतीय सेना में शामिल नहीं करते, नेताजी को स्वतंत्रता-सेनानीका दर्जा नहीं दिलवाते, और... जैसाकि हम और आप जानते ही हैं... हमारी पाठ्य-पुस्तकों में स्वतंत्रता-संग्राम का इतिहास लिखते वक्त इसमें नेताजी और उनकी आजाद हिन्द सेना के योगदान का जिक्र न के बराबर किया जाता है।
(उल्लेखनीय है कि 15 से 18 जुलाई 1947 को कानपुर में आई.एन.ए. के सम्मेलन में नेहरूजी से इस आशय का अनुरोध किया गया था कि आजादी के बाद आई.एन.ए. (आजाद हिन्द) सैनिकों को नियमित भारतीय सेना में वापस ले लिया जाय, मगर नेहरूजी इसे नहीं निभाते; जबकि मो. अली जिन्ना पाकिस्तान गये आजाद हिन्द सैनिकों को नियमित सेना में जगह देकर इस अनुरोध का सम्मान रखते हैं।) 
               
हमें सुभाष बोस का इस्तेमाल करना होगा
जादवपुर विश्वविद्यालय की प्रो. पूरबी रॉय एशियाटिक सोसायटी के तीन सदस्यीय दल की एक सदस्या के रुप में ओरिएण्टल इंस्टीच्यूट’, मास्को जाती हैं- 1917 से 1947 तक के भारतीय दस्तावेजों के अध्ययन के लिए (शोध का विषय है- भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी का इतिहास)।
यह 1996 की बात है।
उन्हें पता चलता है कि साइबेरिया के ओम्स्क शहर में, जहाँ कि आजाद हिन्द सरकार का कौन्सुलेट था, सेना की आलमारियों में नेताजी से सम्बन्धित काफी दस्तावेज हैं और भारत सरकार के एक आधिकारिक अनुरोध पर ही उसे शोध के लिए खोल दिया जायेगा।
प्रो. रॉय पत्र लिखकर इस बात की सूचना भारत सरकार को देती हैं।
पत्र के जवाब में उनका शोध रोक दिया जाता है (शोध का खर्च सरकार ही उठा रही थी)। उन्हें बुला लिया जाता है और दुबारा मास्को नहीं जाने दिया जाता।
हालाँकि इस बीच प्रो. रॉय एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हासिल करने में सफल रहती हैं। वह दस्तावेज है- मुम्बई में नियुक्त (सोवियत गुप्तचर संस्था) के.जी.बी. के एक एजेण्ट की रिपोर्ट, जिसमें भारत की राजनीतिक परिस्थितियों का आकलन करते हुए एक स्थान पर कहा जा रहा हैः
”....नेहरू या गाँधी के साथ काम करना सम्भव नहीं है, हमें सुभाष बोस का इस्तेमाल करना ही होगा।“ (… It is not possible to work with Nehru or Gandhi, we have to use Subhas Bose.)
यह रिपोर्ट 1946 का है। अर्थात् 1946 में नेताजी जीवित थे और सोवियत संघ में ही थे!

स्तालिन की बेटी का बयान
मार्च 1967 में स्तालिन की बेटी श्वेतलाना को भारत आने की अनुमति मिलती है- अपने पति स्वर्गीय ब्रजेश सिंह का अस्थिभस्म उनके परिजनों को सौंपने के लिए। यहाँ प्रेस-कॉन्फ्रेन्स कर वे अपने पिता स्तालिन के शासन की निन्दा करती हैं और अमेरीकी दूतावास से शरण माँग लेती हैं। सोवियत संघ के साथ सम्बन्ध न बिगड़े, इस डर से भारत सरकार उन्हें स्वीजरलैण्ड होते हुए अमेरीका जाने का मशविरा देती है- वे ऐसा ही करती हैं।
प्रेस-कॉन्फ्रेन्स में श्वेतलाना नेताजी के बारे में बताती हैं कि नेताजी साइबेरियायी शहर याकुत्स्क की जेल के बैरक नम्बर 465 में रहते थे। उनके द्वारा किया गया यह रहस्योद्घाटन उस समय सभी अखबारों में छपा था।
श्वेतलाना स्तालिन की सौतेली बेटी थीं- उनकी माँ स्तालिन की सचिव रहीं थीं। (श्वेतलाना की मृत्यु वर्ष 2011 में हुई।)
*****


4.7(क) नेताजी सोवियत संघ में ही थेः
4 अनुमानित स्थितियाँ


अब हम यह अनुमान लगायेंगे कि सोवियत संघ में रहते हुए नेताजी किन-किन स्थितियों से गुजरे होंगे।

पहली स्थितिः
नेताजी ने सोवियत सेना की मदद माँगी होगी
सिंगापुर छोड़ते वक्त नेताजी ने घोषणा की थी कि उनकी आजाद हिन्द सरकार आत्म-समर्पण नहीं करेगी, और वे भारत को आजाद कराने के लिए नये सिरे से युद्ध की शुरुआत करेंगे।साथ ही, अपने विश्वस्त सहयोगियों से उन्होंने यह भी कहा था कि. भारत दो वर्षों के भीतर आजाद हो जायेगा।
(भारत ठीक दो वर्ष बाद अगस्त’ 47 में आजाद होता है। तथ्यों और परिस्थितियों का आकलन करते हुए किये गये नेताजी के पूर्वानुमान कभी गलत नहीं हुए। जहाँ तक इम्फाल-कोहिमायुद्ध में हार की बात है- वास्तव में नेताजी इस सैन्य कार्रवाई का इस्तेमाल एक चिंगारीके रुप में करके ब्रिटिश सेना के अन्दर बगावतकी ज्वाला भड़काना चाहते थे। ऐसा होता भी है, मगर तुरन्त न होकर कुछ समय के बाद। इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।)
अर्थात् सोवियत संघ पहुँचने के बाद नेताजी ने सोवियत सेना की मदद से भारत को आजाद कराने की एक योजना बनायी होगी। साथ ही, वे यह भी जानते थे कि अगर सोवियत मदद न मिली, तो भी दो साल में देश को आजाद होना ही है।
नेताजी ने अपनी ओर से कोशिश जरूर की होगी- यह उनके स्वभाव से पता चलता है- 1939 में जब गाँधीजी किसी प्रगतिशील विचारवाले नेता को काँग्रेस का भावी अध्यक्ष नामित नहीं करते, तो परम्परा तोड़ते हुए नेताजी ने दुबारा अध्यक्ष बनना चाहा था। आज 1945 में भी, भारत को अपने ढंग की एक सरकार देने का सपना वे जरूर देख रहे होंगे।
दूसरी तरफ, नेताजी के समाजवादी विचारों से प्रभावित स्तालिन भी चाहेंगे कि नये भारत में उन्हीं के सहयोग से नेताजी के नेतृत्व में एक अधिनायकवादी तथा सैन्य-अनुशासन वाली सरकार ही बने। अतः सोवियत सेना के भारत प्रवेश की कोई योजनासोवियत संघ में जरूर बनी होगी- चाहे वह कागजों में ही रह गयी हो। तभी तो (’46 में) मुम्बई से के.जी.बी. का एजेण्ट लिखता है- हमें बोस का इस्तेमाल करना ही होगा।
स्तालिन वास्तव में नेताजी के विचारों से प्रभावित थे और ’44 में नेताजी का समर्थन न करने के लिए उन्होंने भारतीय साम्यवादी नेताओं की भर्त्सना की थी। भारतीय साम्यवादियों ने ब्रिटिश साम्यवादी दल के प्रभाव में नेताजी के विरोध का फैसला लिया था।
सोवियत सेना के भारत प्रवेश की योजना कई कारणों से ठण्डे बस्ते में चली गयी होगी- ब्रिटेन और सोवियत संघ दोनों (अभी) एक ही पाले में हैं... बड़े खून-खराबे के बाद विश्वयुद्ध समाप्त हुआ है..., ‘युद्धके खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघका गठन हो रहा है..., सोवियत-भारत के बीच हिमालय खड़ा है..., सोवियत सैनिक थके-हारे हैं और अब आराम चाहते हैं..., वगैरह-वगैरह... ।
कुल-मिलाकर, नेताजी सोवियत संघ से कोई नयी मुक्ति सेनालेकर भारत नहीं आते।
यह और बात है कि भारत में उन दिनों, और आजादी के बाद भी कुछ समय तक, ऐसी स्थिति थी कि- रूसी सेना के साथ विमान में बैठकर नेताजी अब दिल्ली पहुँचे कि तब पहुँचे!

दूसरी स्थितिः
नेताजी ने स्वतंत्र भारत में अ-राजनीतिकजीवन बिताना चाहा होगा
चूँकि नेताजी को सोवियत सेना की मदद नहीं मिलती है, अतः अब नेताजी को सोवियत संघ में बैठकर भारत को बँटते हुए देखना है..., बँटवारे के नाम पर अपने लाखों भाई-बहनों को मरते-मारते देखना है..., ‘सत्ता-हस्तांतरणको ही देश की आजादीसमझ कर भोले-भाले देशवासियों को जश्न मनाते हुए देखना है..., वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन को हिज एक्सेलेन्सी’ (ठेठ बोली में कहा जाय तो माई-बाप’) बोलने वाले देश के कर्णधारों को देखना है..., गुलामी के पट्टे के रुप में राष्ट्रमण्डल- कॉमनवेल्थकी सदस्यता की माला को भारत माँ के गले में डले हुए देखना है...
जो भी हो। देश आजाद हो गया है, नेहरूजी प्रधानमंत्री बन गये हैं। अब नेताजी भारत आकर राजनीतिसे दूर एक प्रकार से अवकाशका जीवन बिताना चाहेंगे।
कहते हैं कि नेताजी ने खुद नेहरूजी को व्यक्तिगत चिट्ठी लिखी थी कि उनकी वापसी की व्यवस्था की जाय। यह भी कहा जाता है कि स्तालिन ने भी भारत सरकार को आधिकारिक रुप से सूचित किया था कि वह चाहे तो अब अपने स्वतंत्रता-सेनानीको वापस बुला सकता है। (गोपनीयदस्तावेजों के सार्वजनिकहोने के बाद शायद ये पत्र सामने आयें- बशर्ते कि उन्हें नष्ट न कर दिया गया हो।)
मगर लगता है, इस मामले में भारत सरकार की आधिकारिक लाइन भी वही रही होगी, जो ब्रिटेन की थी- बोस को वहीं रहने दिया जाय, जहाँ वे हैं।
या फिर, देश में अराजकताफैलने की आशंका की चलते सरकार नहीं चाहती कि नेताजी भारत लौटें। गाँधीजी ने भी इस अराजकताकी आशंका की बात कही थी।


तीसरी स्थितिः
नेताजी को भारत-सरकार की मर्जी के खिलाफ देश लौटना गवारा नहीं होगा 
भारत सरकार द्वारा नेताजी की वापसी को अस्वीकार करने के बाद अब स्तालिन नेताजी का क्या करें? या खुद नेताजी अब क्या करें?
क्या स्तालिन ने साइबेरियायी शहर याकुतस्क की जेल में नेताजी को कैद कर दिया? या, नेताजी ने खुद अज्ञातवासके लिए जेल में रहने का फैसला लिया? जब रूसी दस्तावेज सार्वजनिक होंगे, तभी इन प्रश्नों का जवाब मिलेगा।
खैर। नेताजी के इस कथन को याद कीजिये- अगर स्वदेशाभिमान सीखना है, तो सीखो एक मछली से, जो स्वदेश (जल) के बिना तड़प-तड़प कर प्राण देती है।
यानि नेताजी लम्बे समय तक बर्फीले साइबेरिया में नहीं रह सकते। उन्हें भारत लौटना ही है- मगर भारत सरकार उनकी वापसी नहीं चाहती।
ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि भारत सरकार की मर्जी के खिलाफ जाकर नेताजी भारत क्यों नहीं आ सकते?
याद कीजिये, जुलाई 1943 में सतरह दिनों तक दक्षिण-पूर्वी एशियायी देशों का दौरा करके नेताजी ने पहले जनसमर्थनऔर धनजुटाया था, तब जाकर आजाद हिन्द सरकारका गठन किया था। अर्थात्, नेताजी के निर्णय तथ्यों और सच्चाईयों के ठोस धरातल पर आधारित होते हैं- भाषणों में भले भावनाओं का ज्वार होता हो।
देश में यह एक आम धारणा है कि ब्रिटेन ने नेताजी को बीस वर्षों के लिए अपना राजद्रोहीघोषित कर रखा था और सत्ता-हस्तांतरण के समय बाकायदे इस बात पर सहमति बनी थी कि अगर नेताजी बीस वर्षों के अन्दर देश लौटते हैं, तो उन्हें ब्रिटेन को प्रत्यर्पित कर दिया जायेगा।
लोगों की यह धारणा सही है या गलत, यह कभी-न-कभी तो पता चलेगा ही। मगर यहाँ दोनों तरफ से विचार किया जा रहा है।
अगर प्रत्यर्पणवाली बात सही है, तो नेताजी के भारत में प्रवेश करने के बाद देश की न्यायपालिका तक बाध्य हो जायेगी नेताजी को ब्रिटेन प्रत्यर्पित करने के लिए! दूसरी तरफ, देश की जनता ऐसा होने नहीं देगी। अब सरकार यदि जनता के दवाब के सामने झुकती है, तो देश के कानून और न्याय व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगता है, और नहीं झुकती है, तो कमोबेश गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो जाती है!
अगर प्रत्यर्पणपर समझौता नहीं हुआ है, तो भारत आने के बाद नेताजी अपने-आप देश के सबसे लोकप्रिय नेता बन जायेंगे। नागरिक तो नागरिक, सेना का झुकाव भी उन्हीं की ओर होगा। लोग उन्हें चुनाव लड़ने और प्रधानमंत्री बनने के लिए बाध्य करेंगे। जबकि नेहरूजी को राजनीतिक हाशिये पर पहुँचाना नेताजी नहीं चाहेंगे। नेताजी राजनीति में आने से मना करेंगे और तब हो सकता है कि लोग आन्दोलित हो जायें।
कहने का तात्पर्य, चाहे नेताजी को ब्रिटेन प्रत्यर्पित करने का समझौता हुआ हो, या न हुआ हो- दोनों ही स्थितियों में नेताजी के देश में प्रवेश करने पर राजनीतिक अस्थिरताफैलने की आशंका काफी हद तक सही है!
जाहिर है, भारत सरकार की मर्जी के खिलाफ जाकर भारत में प्रवेश करने के इस विकल्प को नेताजी ने खारिज कर दिया होगा; या इस पर विचार किया ही नहीं होगा।

चौथी स्थितिः
नेताजी अप्रकटरूप से भारत आने को तैयार हो गये होंगे 
अब क्या रास्ता बचा?
बेशक, ”अप्रकटरुप से भारत में प्रवेश करने का।
अगर नेताजी नेहरूजी को वचन दे दें, कि वे आजीवन अप्रकटही रहेंगे, तो नेहरूजी उन्हें भारत आने की अनुमति दे सकते हैं... 
नेहरूजी इतना तो जानते ही हैं कि नेताजी अपना वचन नहीं तोड़ेंगे...
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10 comments:

  1. कुछ कारणों से चित्र पोस्ट नहीं हो सकें. बाद में कभी जोड़ दिया जायेगा.

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  2. मैंने तो पहले भी इसके बारे कुछ पढ़ा था लेकिन आपके इस विस्तृत लेख ने हमारी आंखे खोल दी , कभी राजतन्त्र प्राप्त करने के लिए राजा अपने बाप भाई की हत्या करते थे , नेहरु ने वही कृत हमारे देश के सच्चे देशभक्त सुभाष चन्द्र भोष के साथ किया , हमें तो नफरत होगई इस नेहरु खानदान से
    dabirnews.blogspot.com

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  3. इस विषय पर सृजन शिल्पी पहले लिख से लिख रहे थे, फिर अचानक सब खत्म. पता नहीं ऐसा क्यों होता है. आपने यहाँ लिख कर अच्छा कार्य किया है. साधूवाद स्वीकारें.

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  4. दरअसल यह लेखमाला सिर्फ नेताजी के 'अन्तर्धान रहस्य' पर ही केन्द्रित नहीं है. यह 1941 से ही नेताजी से जुड़े उन तथ्यों और प्रसंगों को बता रहा है, जिनके बारे में हम कम जानते हैं.
    उसी क्रम में अन्तरधान रहस्य का भी जिक्र आ गया.
    यह और बात है कि अन्तर्धान रहस्य वाली कड़ियों को मैंने संक्षिप्त करने की ज्यादा कोशिश नहीं की है.
    मैंने पाया था कि इण्टरनेट पर नेताजी पर ढेर सारी जानकारियाँ उपलब्ध हैं, मगर दुर्भाग्य से सारी-की-सारी अँग्रेजी में. इसलिए मैंने इस लेखमाला का बीड़ा उठाया.
    एक और बात है. जो बात बीत गयी है, उसे तो मैं लिख ही रहा हूँ; मैं यह भी सोचता हूँ कि नेताजी 'दिल्ली पहुँच गये होते' तो वे कैसा शासन करते! क्या आज हम उनकी मर्जी के मुताबिक भारत का निर्माण नहीं कर सकते?
    इस लेखमाला के अन्त में मैं जो कहना चाहता था, उसे कह रहा हूँ. कृपया http://khushhalbharat.blogspot.com/ पढकर देखें और बतायें कि नेताजी कुछ ऐसा ही शासन नहीं करते?

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  5. जयदीप भाई, लगे रहिये .......बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

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  6. "अब नेताजी को सोवियत संघ में बैठकर भारत को बँटते हुए देखना है..., बँटवारे के नाम पर अपने लाखों भाई-बहनों को मरते-मारते देखना है..., ‘सत्ता-हस्तांतरण’ को ही देश की “आजादी” समझ कर भोले-भाले देशवासियों को जश्न मनाते हुए देखना है..., वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन को ‘माई-बाप’ बोलने वाले देश के कर्णधारों को देखना है..., गुलामी के पट्टे के रुप में ‘राष्ट्रमण्डल- कॉमनवेल्थ’ की सदस्यता की माला को भारत माँ के गले में डले हुए देखना है... "
    अभी भी वक्त है इन भूलों को जनता/आवाम सुधार सकती है. आजाद हिंद देश (पाकिस्तान + भारत + बंगलादेश) की स्थापना की सपथ हम सब को लेनी ही होगी, धनलोलुप और पद लोलुप लोगो को सत्ता से हटाना ही होगा और संच्मुच जनता की , आवाम की सरकार बनानी होगी, जहाँ जाति, संप्रदाय, भाषा, क्षेत्र का सारा भेद-भाव मिटाना ही होगा.
    http://www.facebook.com/note.php?note_id=174937662526411

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  7. kuchh anchhue pahlu ....Netaji Amar rahen .....

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  8. Kosa Mahaveer PrasadJune 2, 2011 at 8:10 AM

    Netaji real mei azadi ke hero the...jai hind

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  9. nehru ko apni kurshi khatre mai dikhai par rahi hogi.....netaji kahi aa gaye to......

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  10. i find that it is very much upto the point of truth but how neta ji was brought in BHARAT by secretly and kept in red fort where he was killed & burried under military and now by knowing that it is going to be out, military has been removed to remove remains of neta ji so that nothing remains as proofe
    LORD KRISHNA IS BEHIND NETA JI TO WHOM OTHER RELIGION DOES NOT BELIEVE WILL PROVE THE FACTS VERY SOON AND THEN WHOLE WORLD WILL FOLLOW BHARAT AS SUPER POWER
    JAY HIND JAY BHARAT

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