Blog Header Naaz-E-Hind

Blog Header Naaz-E-Hind

Monday, September 27, 2010

4.2 जापान पर परमाणु बम




जापानी विश्वयुद्ध में नाजियों की तरह कोई जनसंहार नहीं चलाते हैं।
यूरोपीय तथा अमेरीकी एशियायियों से श्रेष्ठ हैं और इसलिए उन्हें एशिया पर शासन करने का अधिकार प्राप्त है- इस सिद्धान्त को वे चुनौती देते हैं और एशिया- एशियायियों के लिएका नारा देते हैं। फिलीपीन्स में अमेरीकी; इण्डो-चायना (वियेतनाम) में फ्राँसीसी और सिंगापुर, मलाया, स्याम, बर्मा, भारत में ब्रिटिश डटे हुए हैं। इनके खिलाफ युद्ध छेड़ने से पहले प्रत्येक जापानी सैनिक को एक-एक पर्चा देकर बाकायदे युद्ध का उद्देश्य समझाया जाता है। यूरोपीय-अमेरीकियों को हराकर जापानी इनकी श्रेष्ठता पर प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं।
हाँ, कुछ कलंक जापानियों के माथे पर जरूर लगते हैं और वे हैं- कोरियाई युवकों का मजदूरों के रुप में तथा कोरियाई युवतियों का जापानी सैनिकों के मनोरंजन के लिए जबरन इस्तेमाल। (इन युवतियों को आराम पहुँचाने वाली महिलाएँ’- ‘कम्फर्ट वूमनकहा गया।) अण्डमान पर भी कब्जे के बाद जापानी नौसैनिकों ने स्थानीय लोगों पर काफी जुल्म ढाये थे। कहा तो यहाँ तक जाता है कि अण्डमान की हर महिला जापानी सैनिकों के हवस का शिकार बनी थी। 
आम तौर पर माना जाता है कि विश्वयुद्ध में रोम और बर्लिन के पतन के बाद टोक्यो ने आखिरी जापानी के जीवित रहने तक ब्रिटिश-अमेरीकियों से युद्ध जारी रखने का फैसला लिया है; मगर वास्तव ऐसा नहीं था। मई 1945 में ही जापान ने स्वीजरलैण्ड में कार्यरत अमेरीकी गुप्तचर संस्था ओ.एस.एस. (ऑफिस ऑव स्ट्रेटेजिक सर्विस) के माध्यम से अमेरीका के पास दो शर्तों पर आत्म-समर्पण का प्रस्ताव भेज दिया था।
वे शर्तें हैं: पहली- जापान के सम्राट के पद को बरकरार रखा जाय; और दूसरी- सम्राट हिरोहितो पर युद्धापराध का मुकदमा न चलाया जाय। इन शर्तों को अनुचित नहीं कहा जा सकता। कारण- जापानी राजवंश विश्व के प्राचीनतम राजवंशों में से एक है। 660 ईसा पूर्व से यह राजवंश कायम है और हिरोहितो 124वें सम्राट हैं। जापानियों के लिए उनके सम्राट सूर्य देवता आमातेरासुके अंश हैं। इतने पुराने राजवंश की रक्षा की जानी चाहिए। दूसरी बात, हिरोहितो का विश्वयुद्ध में कोई योगदान नहीं है। हिरोहितो अपना समय शतरंज खेलने तथा युद्ध सम्बन्धी किताबें पढ़ने में बिताते हैं। युद्ध की कमान प्रधानमंत्री सह युद्धमंत्री जेनरल हिदेकी तोजो के हाथों में है।
12 अप्रैल 1945 को अमेरीकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट के निधन के बाद उपराष्ट्रपति ट्रुमैन अभी अमेरीका के राष्ट्रपति हैं। वे जापान की इन शर्तों को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। हालाँकि ट्रुमैन के सभी नागरिक व सैन्य सलाहकार- एक जेम्स बायर्न्स (James Byrnes) को छोड़कर- यही सलाह देते हैं कि जापान की शर्तों को मान लेते हुए उन्हें आत्मसमर्पण करने दिया जाय। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विन्सटन चर्चिल और उनकी सैन्य कमान का नेतृत्व भी ट्रुमैन से यही अनुरोध करता है। मगर ट्रुमैन अकेले जेम्स बायर्न्स की बातों में हैं और 26 जुलाई 1945 को पोट्सडैम घोषणा में जापान को बिना शर्तआत्मसमर्पण करने या गम्भीर परिणाम भुगतने की अन्तिम चेतावनी दे डालते हैं। (बिना शर्त आत्मसमर्पणकी अवधारणा रूजवेल्ट की ही थी।)   
दरअसल, 16 जुलाई को न्यू मेक्सिको के अलामागोर्डो मरूस्थल के निकट परमाणु बम का सफल परीक्षण हो चुका है, और अब उसका इस्तेमाल देखने के लिए बायर्न्स और ट्रुमैन बेचैन हो रहे हैं। पोट्सडैम घोषणा से एक दिन पहले 25 जुलाई को ट्रुमैन गुप्त रुप से जापान पर परमाणु बम गिराने का आदेश दे चुके हैं। उनके आदेश के अनुसार पहला परमाणु बम जापान पर अगस्त में गिराया जाना है- जब वे पोट्सडैम से वापसी के रास्ते पर होंगे। 
प्रशान्त क्षेत्र के अमेरीकी कमाण्डिंग जेनरल मैक आर्थर को जानकारी दिये बिना- सीधे वाशिंगटन के आदेश पर- मेरियाना द्वीप समूह के अमेरीकी सैन्य अड्डे में पहले दो परमाणु बम पहुँचा दिये जाते हैं- इन्हें 6 और 9 अगस्त को गिराया जाना है। बाकी बम बाद में मेरियाना पहुँचेंगे। उनमें से तीसरे बम को अगस्त के तीसरे हफ्ते में गिराना है। इसके बाद सितम्बर में तीन और फिर अक्तूबर में तीन और बम गिराये जाने की योजना है।
***
6 अगस्त 1945
सुबह का मनोरम मौसम। मेरियाना द्वीप समूह के अमेरीकी सैन्य अड्डे से तीन अमेरीकी विमान गरजते हुए उड़ान भरते हैं। पहले बी-29 विमान इनोला गेके चालक हैं- कर्नल पॉल टिबेट्स। इसी विमान में छुपा बैठा है- छोटा लड़का। दुनिया के पहले परमाणु बम को लिट्ल ब्वॉयका छद्म नाम दिया गया है। दूसरे विमान में वैज्ञानिकों का दल बैठा है- जो बम के असर का अध्ययन करेंगे- इस वक्त हिरोशिमा वासी उनके लिए गिनीपिगके बराबर हैं। तीसरे विमान में छायाकार बैठे हैं।
हिरोशिमा में 8 बजकर 15 मिनट हो रहे हैं। कुछ ही क्षणों पहले एक अमेरीकी बी-29 विमान यहाँ से लौटकर गया है। ऑल क्लियरका सायरन बज चुका है। सब कुछ सामान्य है। मजदूर काम में लगे हैं। छात्र-छात्रायें नगर से कीमती सामानों को निकालकर बाहर खुले में जमा करने में व्यस्त हैं।
मात्र तीन विमानों को आते देख लोगों ने समझा- जासूसी विमान होंगे।
तीनों विमान नगर के ऊपर आते हैं।
लिट्ल ब्वॉयको पैराशूट से नीचे गिराया जाता है।
जमीन से 580 मीटर (1,900 फीट) ऊपर बम फूटता है।
मानों हजारों सूर्य एकसाथ चमक उठे हों।
लगभग 80,000 लोग कुछ समझने से पहले ही खाक हो जाते हैं- कोई सुरक्षित स्थान तक नहीं पहुँच पाता। (बाद के दिनों में हजारों और मरते हैं। रेडियोधर्मिता का असर तो दशकों तक रहता है और अपंग बच्चे पैदा होते हैं।)
हिरोशिमा नगर के 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में हर चीज बर्बाद हो जाती है।
विस्फोट से लगी आग तीन दिनों तक जलती रहती है।
9 अगस्त को यही सब कुछ नागासाकी नगर में दुहराया जाता है। इस दूसरे बम का छद्म नाम है- मोटा आदमीयानि फैट मैन। (यह प्लूटोनियम किस्म का बम है, जबकि पहला बम यूरेनियम किस्म का था।) इसे गिराया तो जाना था कोकुरा पर, पर वहाँ बादल छाये रहने के कारण पास के बन्दरगाह नगर नागासाकी को चुना जाता है। नगर में पहाड़ होने के कारण शहर का दो तिहाई हिस्सा बर्बादी से बच जाता है और पहले से शक्तिशाली बम होने के बावजूद, पहले से कम- 40,000 के करीब- लोग पलक झपते मरते हैं।
***
14 अगस्त 1945 को जापान घुटने टेक देता है।
15 अगस्त की दोपहर को इसकी सूचना सम्राट हिरोहितो रेडियो पर अपने लोगों को देते हैं। यह पहला अवसर है, जब जापानी जनता रेडियो पर अपने सम्राट की आवाज सुन रही है।
इसी दिन मित्रराष्ट्र वाले विजय दिवस की घोषणा करते हैं।
2 सितम्बर को जापान द्वारा आत्मसमर्पण के कागजातों पर हस्ताक्षर करने के बाद द्वितीय विश्वयुद्ध आधिकारिक रुप से समाप्त होता है।
जेनरल तोजो पर युद्धापराध का मुकदमा चलता है और उन्हें फाँसी दे दी जाती है।
जापान के सम्राट के पद को बरकरार रखा जाता है और हिरोहितो पर युद्धापराध का मुकदमा नहीं चलाया जाता। हिरोहितो 1926 में गद्दी पर बैठे थे और 1989 में अपनी मृत्यु तक सम्राट बने रहते हैं।
यानि, जापान की शर्तें अमेरीका को पहले से ही मंजूर थीं। फिर परमाणु बम का प्रयोग क्यों?
दरअसल, परमाणु बम गिराकर अमेरीका एक तीर से चार निशाने साधने में सफल रहता है-
1. बम की जाँच, कि यह काम करता भी है;
2. ‘पर्ल-हार्बरका बदला;
3. दुनिया पर, खासकर सोवियत संघ पर धौंस, कि अमेरीका के पास सबसे खरनाक हथियार है; और
4. अमेरीकी जनता को जवाब कि आपके टैक्स के पैसे जो बम बनाने में खर्च हुए थे, वे बेकार नहीं गए- विश्वयुद्ध को समाप्त करने में काम आये।
*****





4.2 (क)

परमाणु बम पर अतिरिक्त जानकारी     


यूँ तो परमाणु बम की कहानी की शुरुआत 1932 में उसी दिन से हो गयी थी, जिस दिन चैडविक ने परमाणु के तीसरे कण न्यूट्रॉन की खोज की थी। मगर मुख्य रुप से यह अल्बर्ट आइंस्टाईन की थ्योरीऔर एनरिको फर्मी के प्रैक्टिकलका परिणाम है।
संयोग देखिये- आइंस्टाईन हिटलर के अत्याचारों से त्रस्त होकर जर्मनी से भागकर अमेरीका पहुँचे हैं और फर्मी मुसोलिनी के अत्याचारों से त्रस्त होकर इटली से भागकर अमेरीका पहुँचे हैं।
1934 में हंगरी के भौतिकशास्त्री लियो जिलार्ड के प्रयोगों से यह सिद्ध होता है कि न्यूट्रॉनों की बौछार से परमाणु के नाभिक को तोड़ा जा सकता है। टूटे नाभिकों से न्यूट्रॉन छिटक कर अलग हो जाते हैं और ये मुक्त न्यूट्रॉन अन्य नाभिकों को भी तोड़ सकते हैं। इस प्रकार, एक शृँखलाबद्ध अभिक्रिया (Chain Reaction) की शुरुआत की जा सकती है। इस अभिक्रिया में परमाणु के द्रव्यमान का एक बहुत-ही छोटा-सा अंश नष्ट हो जाता है। नष्ट होने वाले इस द्रव्यमान के बदले- सिद्धान्ततः- थोड़ी ऊर्जा पैदा होनी चाहिए। उस ऊर्जा की मात्रा भला कितनी होगी?
इसका उत्तर आइंस्टाईन देते हैं- प्रकाश की गति (प्रायः 3,00,000 किलोमीटर प्रति सेकण्ड) के वर्ग को (नष्ट होने वाले) द्रव्यमान की मात्रा से गुणा करने पर जो राशि प्राप्त होगी, उतनी ही मात्रा में ऊर्जा पैदा होनी चाहिए। इसे सूत्र में कहा जायेगाः E = mc2, जहाँ E = ऊर्जा (Energy), m = द्रव्यमान (Mass) और c = प्रकाश की गति (Candela)। यह एक अकल्पनीय मात्रा है। मगर थ्योरी तो यही कहती है!
हिटलर-मुसोलिनी के अत्याचारों से त्रस्त होकर जिलार्ड भी ब्रिटेन में शरण लेते हैं और 1935 में अपने शोध के कागजात ब्रिटिश सरकार को सौंपते हैं।
थ्योरीको प्रैक्टिकलमें बदलने के प्रयास शुरु होते हैं। उच्च क्षमता वाले न्यूट्रॉनों की बौछार परमाणु नाभिकों पर की जाती है। नाभिक टूटते हैं; न्यूट्रॉन भी मुक्त होते हैं, मगर चैन रिएक्शनकी शुरुआत नहीं होती।
एक अन्य वैज्ञानिक सुश्री लिज मेइट्नस पता लगाती हैं कि चैन रिएक्शन के लिए उच्च क्षमता नहीं, बल्कि निम्न क्षमता वाले न्यूट्रॉनों की जरुरत है।
यूरोप में विश्वयुद्ध के बादल छा रहे हैं। जिलार्ड तथा कुछ वैज्ञानिक इस ऊर्जा को बम में बदलने के बारे में सोचने लगते हैं। मगर इसके लिए आवश्यकता है- अत्याधुनिक तकनीक, बड़ी मात्रा में धन और अनुकूल परिस्थितियों की। अमेरीका के पास ये तीनों चीजें हैं।
1939 में आइंस्टाईन और जिलार्ड के संयुक्त आग्रह पर रूजवेल्ट परमाणु शक्ति के विकास के लिए संसाधन खर्च करने को राजी हो जाते हैं।
मैनहटन प्रोजेक्टनाम से एक गोपनीय संयंत्र की स्थापना होती है। शुरु में खर्च के लिए राशी तय की जाती है- 6,000 डॉलर। 1945 तक यह रकम बढ़कर हो जाती है- 1,20,00,00,00,000 (एक खरब, बीस अरब) डॉलर।
यूरोप में विश्वयुद्ध चल रहा है।
इधर अमेरीका में दुनियाभर के वैज्ञानिक, इंजीनियर और सैन्य अधिकारी मैनहटन प्रोजेक्ट में जुटे हुए हैं।
यूरेनियम के एक अत्यन्त दुर्लभ समस्थानिक (आईसोटोप) यूरेनियम-235 की व्यवस्था की जाती है। अभिक्रिया को नियंत्रित रखने की व्यवस्था की जाती है। और भी बहुत तरह की परेशानियाँ हैं। प्रोजेक्ट से जुड़े कई वैज्ञानिकों को तो विश्वास ही नहीं है कि ऐसा कोई बम बन सकता है।
मगर 2 सितम्बर 1942 को एनरिको फर्मी के नेतृत्व में वैज्ञानिकों का दल नियंत्रित चैन रिएक्शन कराने में सफल हो जाते हैं।
राष्ट्रपति भवन, वाशिंगटन में सांकेतिक भाषा में सन्देश पहुँचता हैः
इतावली नाविक ने किनारा पा लिया।
जल्दी ही रॉबर्ट ओपेनहाइमर के नेतृत्व में असली बम भी बना लिया जाता है।
16 जुलाई 1945 को इसका परीक्षण होता है न्यू मेक्सिको के निकट अलामागोर्डो के मरूस्थल में।
बहुत ही तेज रोशनी की चमक पैदा होती है, और इसके मिनट भर बाद प्रचण्ड आवाज।
मेढ़क के छाते के समान धुएँ का विशाल गुबार ऊपर ऊठकर 40,000 फीट की ऊँचाई तक जा पहुँचता है।
इसके बाद 6 और 9 अगस्त को बम की मारक क्षमता का प्रयोग जापान पर होता है, जिसकी थोड़ी चर्चा हम पहले कर चुके हैं।
एक तो बम का प्रहार नागरिकोंपर होता है; दूसरे, ‘परम्परागतयुद्ध से ही जापान को महीने भर में हराया जा सकता था; और तीसरे, जापान दो सामान्य शर्तों पर आत्मसमर्पणकरने को राजी था, अतः इस परमाणु बम प्रहार की दुनियाभर में निन्दा होती है। इसे युद्धापराधऔर मानवता के खिलाफ अपराधबताया जाता है।
सर्वप्रथम आलोचना करनेवालों में आइंस्टाईन और जिलार्ड भी हैं, जिनके आग्रह पर इस बम का जन्म हुआ था।
सैन्य अधिकारी वैज्ञानिकों पर दोष मढ़ते हैं कि उनके पास एक खिलौना था और वे इसे चलाकर देखना चाहते थे। वैज्ञानिक बमप्रहार को राजनीतिक और कूटनीतिक फैसला बताते हैं, न कि वैज्ञानिक या सैन्य फैसला।
जिलार्ड ने कहा- अगर जर्मनी ने पहले बम बनाकर इसका प्रयोग कर लिया होता, तो क्या बाद में बमप्रहार को युद्धापराध बताकर हम इससे जुड़े जर्मनों को फाँसी पर न लटका देते?
मगर अमेरीकियों का दो परमाणु बम प्रहार माफ है। समर्थ को दोष लगता भी तो नहीं!
हिरोशिमा-नागासाकी में बमप्रहार से जीवित बचे लोगों को हिबाकुशाकहा गया- विस्फोट-प्रभावित लोग2005 तक 2,66,000 हिबाकुशा थे।
परमाणु बम के जख्म से घायल जापान बाद के दिनों में आण्विक हथियारों से दूरी बनाये रखने की नीति- पैसिफिज्म- को अपनाता है।
***
आज हमारी दुनिया में परमाणु हथियारों का जखीरा इतना बड़ा है कि हम अपनी पृथ्वी को एक-दो बार नहीं, दस-बीस बार तबाह कर सकते हैं।
जरा सोचिए, अपनी ही पृथ्वी को, अनन्त ब्रह्माण्ड का इकलौता नीला ग्रह, जहाँ जीवनकी लौ टिमटिमा रही है...
***** 

"नाज़-ए-हिन्द सुभाष" का

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर और ज्ञानवर्धक जानकारी दी है आपने ........ आभार

    पढ़िए और मुस्कुराइए :-
    आप ही बताये कैसे पार की जाये नदी ?

    ReplyDelete
  2. वाह, एक ही पोस्ट में कित्ती सारी जानकारी...अच्छा लगा यहाँ आकर.
    पाखी की दुनिया में आपका स्वागत है.

    ReplyDelete
  3. इस भयानक जानकारी के लिये आप क धन्यवाद

    ReplyDelete

  4. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

    ReplyDelete