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Tuesday, June 29, 2010

3.2 सिंगापुर: “सुभाषजी आ गये”



27 जून (1943) को रासबिहारी बोस के साथ नेताजी टोक्यो से सिंगापुर पहुँचते हैं। अब तक नेताजी की छवि परीकथा के एक जीते-जागते नायक की बन चुकी है। सिंगापुर में वे जिधर से गुजरते हैं, भारतीय उन्हें फूलमालाओं से लाद देते हैं। उनके शब्द सुनकर लोग सम्मोहित हो जाते हैं। नेताजी के स्वागत में लोग गाते हैं-
सुभाषजी सुभाषजी सुभाषजी आ गये
है नाज़ जिस पे हिन्द को वो नाज़-ए-हिन्द आ गये।“ 
4 जुलाई को भारतीय प्रतिनिधियों की विशाल जनसभा में नेताजी कहते हैं-
नागरिक अवज्ञा आन्दोलन से आगे बढ़कर अब भारतीय आजादी के लिए दूसरे रास्ते अपनाने के लिए मानसिक रुप से तैयार हैं। अतः आन्दोलन के अगले चरण का समय आ गया है। भारत के अन्दर या भारत के बाहर जितनी भी संस्थायें हैं, उन सबको अब एक नेतृत्व के नीचे एक लड़ाकू बल के रुप में संगठित हो जाना चाहिए। इस बल का उद्देश्य होगा- वक्त आने पर तथा संकेत मिलने पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ हथियार उठा लेना।
हमारे सामने एक भयानक लड़ाई है। आजादी की इस अन्तिम लड़ाई में आपको भूख, प्यास, जबरन कूच और मौत तक का सामना करना पड़ेगा। जब आप इस परीक्षा में उत्तीर्ण होंगे, सिर्फ तभी आपको आजादी मिलेगी।
सभा में रासबिहारी बोस नेताजी को आई.आई.एल का नेतृत्व और आई.एन.ए. की कमान सौंपने की घोषणा करते हैं-
दोस्तों! यह मेरे जीवन के सर्वाधिक खुशी के क्षणों में से एक है। हमारी महान मातृभूमि के महानतम सपूतों में से एक को मैं यहाँ लेकर आया हूँ हमारे अभियान में सहभागी बनने के लिए। आज मैं आप सब की उपस्थिति में ईस्ट एशिया के इण्डियन इण्डिपेण्डेन्स लीग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देता हूँ। अब से सुभाष चन्द्र बोस आपके अध्यक्ष, आजादी की लड़ाई में आपके नेता होंगे; और मुझे यकीन है कि उनके नेतृत्व में आप युद्ध में भाग लेंगे और विजयी होंगे।“      
इस सभा में नेताजी को पहनायी जानेवाली फूलमालायें करीब एक ट्रक हो जाती हैं। लोगों को धन्यवाद देने के बाद नेताजी कहते हैं- अपने गले में पहनी गयी इन फूलमालाओं को वे नीलाम करना चाहेंगे। (फौज के गठन के लिए पैसों की जरुरत है।)
25,000 रूपये से बोली की शुरुआत होती है और पहली माला एक करोड़ तीन लाख में बिकती है। इसे मलाया के उद्योगपति हबिबुर रहमान खरीदते हैं। महिलायें भी अपने कीमती गहने देकर मालायें खरीदती हैं।
बनारसवासी शेखर के पास सात लाख रूपये हैं, जो उसकी जीवन भर की कमाई है। वह भी बोली लगाता है, मगर अन्तिम बोली पच्चीस हजार रूपये ऊपर चली जाती है। वह मंच के पास पहुँच जाता है और नेताजी से कहता है- मेरे पास मेरे जीवन भर की पूँजी यह सात लाख रूपये हैं, इसे कुर्बान करके मैं भी आजादी की लड़ाई में हिस्सेदार बनना चाहता हूँ। कृपया यह माला मुझे ही दीजिये।
भावुक होकर नेताजी सम्मान और गर्व के साथ वह माला उसे सौंपते हैं। 
उस नीलामी से कुल पच्चीस करोड़ रूपये आई.एन.ए. को मिलते हैं, जिसकी सुरक्षा के लिये बाद में बाकायदे आजाद हिन्द बैंक की स्थापना होती है।
*****

"नाज़-ए-हिन्द सुभाष" का

4 comments:

  1. साथियों,
    शिवम मिश्रा जी,
    जय हिन्द
    .
    अध्याय 2.5 को संशोधित किया गया है- कृपया एक बार देख लें.
    अध्याय 2.2 में दो छोटे संशोधन हैं- एक, भारतीय युद्धबन्दियों को रेडियो स्टेशन लाया जाता था बी.बी.सी. द्वारा हिन्दुस्तानी भाषाओं में प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों को समझने के लिए (न कि बी.बी.सी. वाले उन्हें लाते थे.) दो, लीज़न के कुछ सैनिकों को पैराशूट द्वारा ईरान में भी उतारने की योजना थी.
    अध्याय 1.7 में भी एक छोटा संशोधन है कि नेताजी के काबुल में होने का राज एक इतावली राजनयिक द्वारा भेजे गये सन्देश से खुला था.
    धन्यवाद.
    - जयदीप

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  2. बहुत बढ़िया और रोचक प्रसंग !
    आपको शुभकामनाएं !

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  3. जयदीप भाई ,
    जय हिंद !
    संशोधनों की जानकारी के लिए आपका बहुत बहुत आभार !

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