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Friday, June 25, 2010

3.1 नेताजी और तोजो



              16 मई 1943 को टोक्यो पहुँचने के बाद भी महीने भर तक नेताजी की पहचान को हालाँकि गुप्त रखा जाता है, मगर नेताजी अपना काम प्रारम्भ कर देते हैं।
17 मई से ही वे जापानी आर्मी चीफ ऑव स्टाफ सुगियामा (Sugiyama), विदेश मंत्री मारोरु सिगेमित्सु (Maroru Shigemitsu), नौसेना मंत्री योनाई (Yonai) और सेनाओं के विभिन्न विभागाध्यक्षों तथा शासन के अन्य मंत्रियों से मिलने लगते हैं।
हाँ, जापानी प्रधानमंत्री जेनरल तोजो से मिलने के लिए उन्हें तीन हफ्ते तक इन्तजार करना पड़ता है। बताया जाता है कि उनपर काम का दवाब है। यह सही भी है, मगर वास्तव में कैप्टन मोहन सिंह प्रकरण से वे कुछ ज्यादा ही खिन्न हैं।
तोजो के इस रवैये से नेताजी के मित्र यामामोतो को इतना पश्चात्ताप होता है कि वे हिकारी-किकानके नेता पद से इस्तीफा दे देते हैं।
नेताजी इस खाली समय का उपयोग फैक्ट्री, स्कूल, अस्पताल, सैन्य संस्थान आदि के भ्रमण में करते हैं। इस भ्रमण का फायदा यह होता है कि नेताजी के समर्थन में एक अच्छी-खासी लॉबी जापान में तैयार हो जाती है।
तीन हफ्ते बाद 10 जून को तोजो नेताजी को मिलने का समय देते हैं, मगर मिलने पर नेताजी के व्यक्तित्व से वे इतने प्रभावित होते हैं कि चार दिनों बाद फिर नेताजी को बुलाते हैं। दुबारा मिलने के दो दिनों बाद 16 जून को नेताजी को जापानी संसद डायटमें आमंत्रित किया जाता है, जहाँ नेताजी को चकित करते हुए तोजो इस ऐतिहासिक घोषणा को जारी करते हैं:
भारत अब तक ब्रिटेन के क्रूर दमनकारी शासन में है इस पर हम रोष व्यक्त करते हैं और आजादी के लिए उसके द्वारा किये जा रहे तीव्र संघर्ष के साथ हम अपनी पूर्ण सहानुभूति व्यक्त करते है। हमने निश्चय किया है कि भारत की आजादी के लिए हम हर सम्भव सहायता देंगे। हमें विश्वास है कि वह दिन दूर नहीं, जब आजादी प्राप्त करके भारत एक खुशहाल देश बनेगा।
18 जून को टोक्यो रेडियो नेताजी के जापान पहुँचने की खबर प्रसारित करता है और 19 को खबर को प्रेस में जारी किया जाता है। यह तीसरी बिजली की लहर है- इस बार इसका असर भारत ही नहीं, दुनियाभर में होता है। भारत की आजादी और नेताजी का जापान में होना अब अन्तर्राष्ट्रीय विषय हैं।
इसके बाद शुरु होता है नेताजी द्वारा बैठकों, साक्षात्कारों, भाषणों और रेडियो प्रसारणों का दौर। नेताजी की योजना स्पष्ट है- एक ओर भारत के अन्दर जनता और सैनिक ब्रिटिश राज के खिलाफ बगावत की स्थिति पैदा कर दे, और दूसरी तरफ बाहर से (जापान के सहयोग से) सैन्य कार्रवाई कर दी जाय।
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"नाज़-ए-हिन्द सुभाष" का

3 comments:

  1. बेहद उम्दा जानकारी, आभार !

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  2. नेताजी को समर्पित ब्लाग पर आकर अच्छा लगा।

    आप अच्छा काम कर रहें,जो दुनिया की नयी पीढी को

    पुन: नेताजी से परिचित करवा रहे है।

    आभार शुभकामनाएं

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