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Tuesday, June 22, 2010

2.6 बर्लिन से टोक्यो: तैयारियाँ






सच तो यह है कि अक्तूबर’ 41 से ही (जर्मनी में तैनात) जापानी अधिकारी नेताजी को जापान ले जाना चाह रहे हैं। बर्लिन स्थित जापानी सैन्य अटैश के कर्नल सातोशि यामामोतो (Satoshi Yamamoto) पहले से ही नेताजी के मित्र बन गये हैं। जापानी राजदूत ले. जनरल ओशिमा हिरोशि (Oshima Hiroshi) भी यदा-कदा नेताजी से मिलते रहते हैं। दरअसल इन्हें पता है कि बहुत जल्द उनका देश बंगाल की खाड़ी तक प्रभुत्व स्थापित करने की योजना बना रहा है; ऐसे में, बर्मा के रास्ते भारत को आजाद कराना नेताजी के लिए ज्यादा उपयुक्त रहेगा।
       दिसम्बर’ 41 में जब जापान पूरी तरह से ब्रिटेन-अमेरीका के खिलाफ युद्ध में शामिल हो जाता है, तब नेताजी भी जापान जाना चाहते हैं और ओशिमा से कहते हैं कि वे अपने स्तर पर उपाय करें। मगर जर्मन विदेश विभाग के अधिकारी नहीं चाहते कि नेताजी जर्मनी छोड़ें; अतः वे ओशिमा की बातों पर ध्यान नहीं देते।
तब ओशिमा सीधे हिटलर से मिलकर अपनी बात कहते हैं। हिटलर सहमत हैं, मगर उनका एक प्रश्न है- क्या टोक्यो नेताजी को पूर्ण समर्थन देगा? इसपर ओशिमा टोक्यो से सम्पर्क करते हैं, मगर संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता। (पहली बात, जापान के पास पहले से ही एक बोसहैं (रासबिहारी बोस), और दूसरी बात, इस लम्बी और खतरनाक यात्रा में अगर नेताजी को कुछ हो गया, तो जापान भारतीयों को क्या मुँह दिखायेगा?)  
समय बीत रहा है। 42 की गर्मियों में स्तालिनग्राद (अब वोल्गोग्राद) में नाजी सेना की बढ़त रूक जाने के बाद तय हो जाता है कि अब नाजी सेना की मदद से भारत को आजाद नहीं कराया जा सकता; और इसी वर्ष सर्दियों में सिंगापुर में आई.एन.ए. का गठन विफल हो जाता है- युद्धबन्दी भारतीय सैनिक आई.एन.ए. में बने रहने के लिए नेताजी की माँग कर रहे हैं। अब जाकर टोक्यो ओशिमा को सन्देश भेजता है कि नेताजी को जापान लाने की व्यवस्था की जाय।
मगर सवाल यह है कि मित्र राष्ट्रकी सेनाओं की आँखों में धूल झोंकते हुए इतनी लम्बी यात्रा पूरी कैसे की जाय! हिटलर मध्य-पूर्व तथा भारत के ऊपर से हवाई यात्रा के सख्त खिलाफ हैं; उनका मानना है कि मित्र राष्ट्र वाले नेताजी के विमान को कहीं भी उतरने के लिए बाध्य कर सकते हैं।
पानी वाले जहाज से यात्रा भी सुरक्षित नहीं है। हाँ, सोवियत संघ के ऊपर से (लुफ्ताँसा कम्पनी के एक विमान द्वारा) नेताजी को भेजने के लिए वे तैयार हैं। मगर इसमें जापान को आपत्ति है। सोवियत के साथ उसकी जो सन्धि है, उसकी किसी कड़ी का इससे उल्लंघन होगा।
नेताजी और यामामोतो इस बीच इतावली विमान की व्यवस्था करने की कोशिश करते हैं। अभ्यासके तौर पर एक विमान रोम से सिंगापुर तक उड़ान भरता है- कोई अवांछित घटना नहीं घटती। फिर भी, मुसोलिनी इतावली विमान से नेताजी को भेजने की अनुमति नहीं देते। (ईश्वर न करे, अगर नेताजी को विमान यात्रा के दौरान कुछ हो गया, तो सदा के लिए इटली के इतिहास में एक धब्बा नहीं लग जायेगा!)
अन्त में, पनडुब्बी यात्रा का विकल्प बचता है। जर्मनी अपनी लम्बी दूरी की एक पनडुब्बी में नेताजी को पूर्व में माडागास्कर के पास एक खास विन्दु तक पहुँचायेगा और उधर से जापान अपनी पनडुब्बी भेजेगा- नेताजी को लिवाने के लिए। कई सन्देशों के आदान-प्रदान के बाद अन्त में ओशिमा, जापानी प्रधानमंत्री जेनरल तोजो की स्वीकृति हासिल कर नेताजी को सूचित करते हैं।
वास्तव में, नेताजी जर्मनी, इटली और जापान, तीनों के लिए मूल्यवान हैं- कोई नहीं चाहता कि इस यात्रा में उनका बाल भी बांका हो।
सब तय होने के बाद एक आखिरी आपत्ति जापानी नौसेनाध्यक्ष द्वारा यह कहकर उठायी जाती है कि जापानी नौसेना के एक प्रावधान के अनुसार युद्ध के दिनों में कोई नागरिक’ (सिविलियन) जापानी पनडुब्बी में सवार नहीं हो सकता। जर्मन राजदूत के मार्फत यह सन्देश पाकर जर्मन विदेश विभाग (स्पेशल इण्डिया ऑफिस) के एडम वॉन ट्रॉफ्फ जवाब में यह टेलीग्राम भेजते हैं-
सुभाष चन्द्र बोस किसी भी नजरिये से सामान्य नागरिक नहीं हैं, वे भारतीय मुक्ति वाहिनी के सेनापति हैं।“ (Subhas Chandra Bose is by no means a private person, but Commander-in-Chief of the Indian Liberation Army.
इस प्रकार आखिरी बाधा भी दूर होती है।
नेताजी को अपने पीछे जर्मनी में न केवल अपनी पत्नी और नन्हीं बेटी को छोड़ आना होगा, बल्कि बहुत ही खास ढंग से प्रशिक्षित इण्डियन लीजन के उन साढ़े तीन हजार बहादूर भारतीय सैनिकों को भी छोड़ आना होगा, जो अपनी मातृभूमि को आजाद कराने का सपना दिलों में संजोये बैठे हैं।
इन सैनिकों को यह नहीं बताया जाता कि नेताजी सदा के लिए जापान जा रहे हैं, बल्कि यह बताया जाता है कि नेताजी दो-एक हफ्तों के लिए जर्मनी से बाहर जाने वाले हैं। इसलिए 26 जनवरी को भारतीय स्वतंत्रता दिवसतथा 28 जनवरी को लीजन दिवसकी पार्टियों में वैसी कोई विदायी नेताजी को नहीं दी जाती।
       नेताजी की अनुपस्थिति में फ्री इण्डिया सेण्टर तथा इण्डियन लीजन का प्रभार नाम्बियार सम्भालेंगे। (ए.सी.एन. नाम्बियार जर्मनी में पत्रकार हैं। वे नेताजी के गहरे मित्र बन जाते हैं।)
***
7-8 फरवरी 1943 की रात।
जर्मनी के किएल शहर का बन्दरगाह।
जर्मन नौसेना की लम्बी दूरी की पनडुब्बी यू-180 (टाईप-9 डी-1) फ्रिगेट कैप्टन वार्नर मुजेनबर्ग (Werner Musenberg) के नेतृत्व में तैयार खड़ी है। जर्मन स्टेट सेक्रेटरी केपलर (Keppler), स्पेशल इण्डिया डीविजन के अलेक्जेण्डर वर्थ (Alexander Werth) और अपने मित्र नाम्बियार के साथ नेताजी किएल पहुँचते हैं।
उनके एडजुटैण्ट आबिद हसन को एक अन्य गाड़ी में बर्लिन से किएल लाया जाता है। पनडुब्बी पर सवार होने तक उन्हें पता ही नहीं होता कि वे नेताजी के साथ जापान जा रहे हैं- सदा के लिए।
*****



2.6 (क)इण्डियन लीजन’ का क्या हुआ?  


नेताजी के जर्मनी छोड़ने के बाद इण्डियन लीजनका क्या हुआ? यह प्रश्न यहाँ उठना स्वाभाविक है। आईए, संक्षेप में लीजन की नियति को जानते हैं।
नेताजी के जाने के दो महीने बाद इण्डियन लीजन को हॉलैण्ड के समुद्र तट पर समुद्री लड़ाई के प्रशिक्षण के लिए भेजा जाता है। कुछ सैनिक विरोध करते हैं कि उन्हें पूर्व में लड़ने जाना है तो पश्चिम में क्यों भेजा जा रहा है। वे इस बात पर भी नाराज हैं कि नेताजी उन्हें छोड़ गये। उन्हें समझाया जाता है कि नेताजी की इच्छानुसार उन्हें समुद्री लड़ाईके प्रशिक्षण के लिए हॉलैण्ड भेजा जा रहा है, और नेताजी उन्हें छोड़ नहीं गये हैं, बल्कि एक खास मिशन पर हैं। अनुशासन के लिए खुला विरोध करनेवाले सैनिकों के रिंगलीडर पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाती है।
पाँच महीनों के बाद उन्हें हथियारों के खास प्रशिक्षण के लिए फ्राँस भेजा जाता है, जहाँ वे दस महीनों तक रहते हैं। फील्ड मार्शल रोमेल (त्वउउमस) यहाँ एक बार लीजन को देखकर उनकी क्षमताओं की प्रशंसा करते हैं।
’44 के बसन्त में लीजन की (तीन में से) एक कम्पनी को इटली भी भेजा जाता है।
जून’ 44 में मित्र राष्ट्र द्वारा फ्राँस के नॉर्मण्डी के तट पर डी-डेकी कार्रवाई के बाद लीजन को वापस जर्मनी लौटने के लिए कहा जाता है। रास्ते में फ्राँसीसी भूमिगत गुरिल्ले जर्मन सैनिकों के साथ इन्हें भी निशाना बनाते हैं। ब्रिटिश और फ्रेंच सेनाओं के साथ बहादूरी पूर्वक कई लड़ाईयाँ भी ये लड़ते हैं।
इसी दौरान इन भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश सेना में आने का लालच दिया जाता है- कुछ छोड़कर जाते भी हैं, मगर उन्हें फ्राँसीसी सैनिकों द्वारा भरे बाजार में (जर्मन युद्धबन्दियों के साथ) गोली मार दी जाती है।
’44-‘45 की सर्दियों में लीजन को पहले दक्षिणी जर्मनी के एक शान्त गाँव में और फिर ह्यूबर्ग के किले में रखा जाता है।
फरवरी’ 45 में जर्मनी का पतन आरम्भ हो जाता है- पश्चिम से मित्र राष्ट्र की, और पूर्व से रूसी सेनाएँ जर्मनी में प्रवेश करती हैं।
मार्च में दुर्ग छोड़कर लीजन अल्पाईन दर्रे से होकर स्वीजरलैण्ड जाने की कोशिश करता है। बर्लिन मुख्यालय से उनका सम्पर्क टूट जाता है।
7 मई 45 को जर्मनी के आत्म समर्पण के बाद इन भारतीय सैनिकों को अमेरिकी तथा फ्राँसीसी सेनाओं द्वारा बन्दी बना लिया जाता है। अमेरिका अपने बन्दियों को तो ब्रिटेन को सौंप देता है, जो भारत के युद्धबन्दी शिविरों में पहुँच जाते हैं, मगर फ्राँसीसी सेना लीजन के ज्यादातर सैनिकों को गोली मार देती है।
जो बचते हैं, वे फ्राँस की जेलों में कष्टदायक मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार, ‘इण्डियन लीजन’, (अर्थात् जर्मन सेना की 950वीं भारतीय वाहिनी/950th Indian Regiment) की गाथा समाप्त होती है।
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"नाज़-ए-हिन्द सुभाष" का

4 comments:

  1. मैं इस छायाचित्र के बारे में कुछ कहना चाहूँगा. मई 06 में मुखर्जी आयोग की रपट सार्वजनिक होने के बाद मैं अपनी त्रैमासिक पत्रिका "मन मयूर" के लिए एक लेख की तैयारी कर रहा था- 'नेताजी का अंतर्धान होना: परिस्थितिजन्य साक्ष्य क्या कहते हैं?' तब पिताजी को जैसे अचानक कुछ याद आया, और काफी खोज कर अपने संग्रह से यह अखबार का कतरन मुझे दिया. दाढ़ी और काले चश्मे में जर्मन पनडुब्बी पर सवार नेताजी के इस छायाचित्र को देखकर मैं अभिभूत रह गया. पता नहीं मेरे पिताजी ने इसे कब से सम्भाल कर रखा था.
    बँगला अखबार में छपे इस छायाचित्र के नीचे 'स्वत्वाधिकारी' के रुप में 'श्री शिशिर कुमर बसु' (नेताजी के भतीजे) का नाम छपा है.
    मैं तो नेताजी के इस छायाचित्र को उनका 'दुर्लभतम' छायाचित्र मानता हूँ. आशा है, आप भी सहमत होंगे.
    ईति,
    -जयदीप

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    1. जयदीप जी आपके द्वारा दी गई जानकारी व छायाचित्र अति दुर्लभनीय है, परनतु इनके बीच के पन्ने( पेज) क्यु गायब है ..? क्या आप पुरी जानकारी हमे मेल कर सकते है?rohitnaruka91@gmail.com

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    2. दरअसल, इस ब्लॉग को eBook का रुप दे दिया गया है:
      http://jagprabha.in/product/naz-e-hind-subhash/

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  2. आपसे १०० % सहमत हूँ ,जयदीप भाई | यह सच में एक 'दुर्लभतम' छायाचित्र है !

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