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Friday, June 11, 2010

1.7: “सुभाष को खोजो और मार डालो”



काबुल में लाहौरी गेट के पास एक सराय में वे लोग ठहरते हैं। इलाका अच्छा नहीं है।
एक अफगानी पुलिसवाले को उनपर शक होने लगता है। वह बार-बार चक्कर लगाता है। अन्त में नेताजी अपनी हाथघड़ी देकर उससे पीछा छुड़ाते हैं।  
नेताजी सोवियत दूतावास से सम्पर्क करते हैं, मगर उन्हें ठण्डा स्वागत मिलता है। स्तालिन ने भले हिटलर से अनाक्रमण सन्धिकर रखी है, पर हिटलर पर उन्हें भरोसा नहीं है। सोवियत संघ पर नाजी आक्रमण होने की दशा में सोवियत को मित्र राष्ट्रकी शरण में जाना पड़ेगा- तब ब्रिटेन और सोवियत एक ही पाले में होंगे। शायद इसीलिए सोवियत दूतावास नेताजी को टाल रहा है।
मगर नेताजी को यूरोप पहुँचना ही है। वे धुरी राष्ट्रके दोनों देशों- जर्मनी और इटली- के दूतावासों से सम्पर्क करते हैं। यहाँ भी देर होती है। इन सबमें डेढ़ महीने बीत जाते हैं- यह नेताजी के लिए व्यग्रता का दौर है।
इसी बीच एक इतावली राजनयिक द्वारा भेजे गये सन्देश से नेताजी के काबुल में होने का राज खुल जाता है। भारत में बिजली की एक लहर-सी दौड़ जाती है।
एक ओर- देशवासी खुश हो जाते हैं कि उनका नेता देश को आजाद कराने के लिए किसी खास मिशन पर है, और दूसरी तरफ ब्रिटिश सरकार गुस्से में आग-बबूला हो जाती है।
तुर्की में तैनात अपने गुप्तचर विभाग के दो विशेष एजेण्टों (Special Operations Executives- SOE) को लन्दन गुप्त आदेश जारी करता है- सुभाष चन्द्र बोस को खोजो और उसकी हत्या कर दो। किसी कीमत पर उसे यूरोप नहीं पहुँचने देना है।
मगर ये एजेण्ट नेताजी को खोज नहीं पाते हैं- उन्हें क्या पता कि नेताजी यहाँ पाँच फीट साढ़े आठ ईंच ऊँचे अफगानी पठान जियाउद्दीनकी वेशभूषा में हैं!
अन्त में इतावली दूतावास काउण्ट ऑरलैण्डो माजोत्ताके पासपोर्ट पर नेताजी को मास्को भेजने की व्यवस्था करता है।
*****

"नाज़-ए-हिन्द सुभाष" का

8 comments:

  1. are waah badhiya aapka blog to kabhi padh hi nahi paaya ab regular padhunga....

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  2. सादर वन्दे!
    बहुत सही दोस्त, लगे रहो .. हमें भी तो असलियत की जानकारी हो !
    वैसे मैंने सुन रखा है ताशकंद समझौते के समय लालबहादुर शास्त्री की मुलाकात उनसे रूस के जेल में हुयी थी| और उन्होंने कहा था की मै इससमझौते में देश हार के जा रहा हूँ लेकिन अपने देशवासियों को ऐसी खबर सुनाऊंगा की देश मुझे कन्धों पर उठा लेगा, इसके बाद उनकी मृत्यु का समाचार मिलता है,
    अब प्रश्न यह उठता है की उस समय शासन अंग्रेजों का ना होकर कांग्रेस का था !
    इस वीर योद्धा को हमारा शत-शत नमन !
    जय हिंद
    रत्नेश त्रिपाठी

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  3. बहुत बढ़िया रचना

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  4. प्रिय साथियों,
    इससे आगे के घटनाक्रम में तथ्यों की भरमार है. उपयुक्त, जरूरी और सीधे नेताजी से जुड़े तथ्यों को चुनने, सम्पादित करने और आलेख को सहज बनाये रखने की कोशिश में समय लग रहा है.
    हो सकता है कि प्रतिदिन के बजाय पत्येक दो-तीन दिनों में अगली कड़ी प्रकाशित हो. इसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ.
    वैसे, मेरा वादा है कि मैं आपलोगों को निराश नहीं करूँगा और नेताजी के बारे में (1941-45) हर वह जानकारी यहाँ प्रस्तुत करूँगा, जिन्हें हर भारतीय को- खासकर, युवा पीढ़ी को- जानना चाहिए- मगर दुर्भाग्यवश जान नहीं पाते हैं.
    आशा है, आपका साथ मिलता रहेगा.
    ईति,
    जयदीप

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  5. आपका ब्लॉग देख कर दिल खुश हो गया, फुर्सत में पूरा पढूंगा, नेता जी को समर्पित आपका ब्लॉग सचमुच बहुत सुन्दर है,
    और आपने जो बीड़ा उठाया है वो काबिले तारीफ़ है, हमारी युवा पीढी जो नहीं जानती कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने आज़ादी के लिए कितने कष्ट सहे, उन्हें ये ब्लॉग ज़रूर पढना चाहिए!
    plz see www.vandematarama.blogspot.com

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  6. जयदीप भाई आप जब भी लिखो हम तैयार है पढने को !

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  7. sanjay prasad,kodarma , jharkhandAugust 14, 2012 at 9:16 PM

    jaideep bhai,aapne amulya jankari dene ka kaam kiya hai. bharatwashi aapke aabhari rahenge.

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